CM SHIVRAJ अगर आशीर्वाद चाहते हैं तो मजदूरों का पैसा लेकर ही INDORE आएं

07 August 2018

इंदौर: पिछले 26 साल से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हुकुमचंद मिल के मजदूरों द्वारा मप्र सरकार के विरुद्ध हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। 5 लाख लोगों के हस्ताक्षर के लक्ष्य को लेकर प्रारंभ इस अभियान के तहत 12 अगस्त को मजदूरों द्वारा राजवाड़ा पर प्रदर्शन किया जाएगा। अब तक 50 हजार लोगों का समर्थन मजदूराें को प्राप्त हो गया है। मजदूरों का कहना है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जन आशीर्वाद यात्रा लेकर जब इंदौर आएं तो साथ में मजदूरों के बकाया पैसों का चेक भी लाए। मिल की जमीन के लैंड यूज को लेकर मप्र सरकार की लापरवाही पर सोमवार को कोर्ट ने मप्र सरकार पर 50 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। 1991 में मिल बंद होने के बाद से आज तक मजूदर अपने बकाया पैसे के लिए संघर्ष कर रहे है।

6 अगस्त 2007 को हाई कोर्ट ने मिल मजदूरों के पक्ष में 229 करोड़ रुपए का क्लेम स्वीकृत किया था। यह पैसा मिल की जमीन बेचकर मजदूरों को प्रदान किया जाना था लेकिन मिल की जमीन पर नगर निगम और मप्र सरकार ने अपना-अपना दावा जता दिया, मामला फिर कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने मप्र सरकार के दावे को खारिज कर दिया। इसके बावजूद अब तक मजदूरों को उनका पैसा नहीं मिला है।

इंदौर मिल मजदूर संघ के महामंत्री हरनाम सिंह धालीवाल ने बताया कि मई 2018 में मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने हुकुमचंद मिल की 42.5 एकड़ जमीन पर मप्र सरकार के दावे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस जमीन पर नगर निगम का स्वामित्व माना। कोर्ट के आदेश के बाद अब तक नगर निगम ने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया है। नगर निगम व मप्र सरकार की उदासीनता से नाराज मजदूरों ने 24 जुलाई से हस्ताक्षर अभियान प्रारंभ किया है। वहीं 5000 पोस्टकार्ड प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी भेजे जाएंगे। रीगल तिराहा, मालवा मिल सहित शहर के विभिन्न क्षेत्रों में मजदूर सड़क पर उतरकर हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।

नवंबर 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि हाईकोर्ट जमीन के मालिकाना हक को लेकर फैसला जल्द से जल्द दे। इस मामले में 1 मई 2018 को अंतिम बहस सुनने के बाद जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 22 मई 2018 को हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए मिल की जमीन पर मप्र सरकार के दावे को खारिज कर दिया था। कोर्ट के इस फैसले से मजदूरों को अपने वेतन के बकाया 229 करोड़ रुपए जल्द मिलने की उम्मीद है।

12 दिसंबर 1991 को हुकुमचंद मिल प्रबंधन ने बगैर किसी सूचना के मिल को बंद कर दिया। इसके बाद से मजदूर ग्रेच्युटी, तनख्वाह और अन्य लेनदारियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मिल की जमीन बेचकर मजदूरों का भुगतान किया जाना है। जिस वक्त मिल बंद हुई थी, उसमें 5895 मजदूर काम करते थे। 6 अगस्त 2007 को हाई कोर्ट ने मिल मजदूरों के पक्ष में 229 करोड़ रुपए का क्लेम स्वीकृत किया था। मिल की 42.5 एकड़ जमीन बेचकर मजदूरों के पैसों का भुगतान किया जाना था लेकिन मिल की जमीन पर मप्र शासन ने अपना अधिकार बताते हुए इसे बिकने से रोक दिया था।

मजदूरों को उनकी मेहनत के 229 करोड़ रुपए का भुगतान शासन को करना है। कुछ माह पहले कोर्ट के आदेश पर मजदूरों को 229 करोड़ में से 50 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया था वहीं अब शेष राशि 179 करोड़ की राशि मजदूरों में बांटी जानी है। हालांकि मजदूरों की मांग है कि 229 करोड़ रुपए के अलावा साल 1991 से अब तक इस राशि पर बने ब्याज का भुगतान भी सरकार द्वारा मजदूरों काे किया जाए।

हुकुमचंद मिल के मजदूर 26 साल से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। मिल के 5895 मजदूरों को ग्रेच्युटी, वेतन के 229 करोड़ों रुपए का भुगतान होना है। कोर्ट ने मिल की जमीन को बेचकर मजदूरों को पैसा देने को कहा था। इसके बावजूद मिल की जमीन बिक नहीं पाई। अपने हक की इस लड़ाई में अब तक लगभग 2000 मजदूरों की मौत हो चुकी है।

हुकुमचंद मिल मामले में क्या क्या हुआ 

12 दिसंबर 1991 को बंद, 5895 मजदूर थे मिल में, 2000 के लगभग मजदूरों की मौत, 6 अगस्त 2007 को कोर्ट ने 229 करोड़ रुपए क्लेम स्वीकृत किया, हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने जारी किए 50 करोड़ रुपए, 1 मई 2018 को हाईकोर्ट ने सुनवाई पूरी होने के बाद आदेश सुरक्षित रखा, 22 मई 2018 को हाईकोर्ट ने फैसला सुनातेे हुए मिल की जमीन पर मप्र सरकार के दावे को खारिज कर दिया।

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