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बीजेपी यूनिवर्सिटी: 1200 सीट, 23 टीचिंग फैकल्टी, एडमिशन 20 | BHOPAL NEWS

22 July 2018

भोपाल। मध्यप्रदेश में स्थापित किए गए अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय और सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय को यदि बीजेपी यूनिवर्सिटी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। दोनों विश्वविद्यालयों से सिर्फ बीजेपी और आरएसएस से जुड़े कुछ लोगों का लालन पालन हो रहा है। हालात यह हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय में सत्र 2018-19 के लिए अब तक केवल 20 एडमिशन हुए हैं जबकि यहां 1200 सीटें हैं। इस विश्वविद्यालय को चलाने के लिए भारी भरकम खर्चे के अलावा अधिकारियों/कर्मचारियों की फौज भी मौजूद है। पढ़ाने के लिए 23 टीचिंग फैकल्टी हैं। यह दुनिया की अकेली यूनिवर्सिटी होगी जहां 2 स्टूडेंट के लिए 1 से अधिक टीचिंग फैकल्टी तैनात है। 

टीचिंग फैकल्टी को थमा दिए टारगेट
पिछली बार सिर्फ 400 स्टूडेंट ने ही एडमिशन लिया था। जबकि 800 सीटें खाली रह गई थीं। इस बार एडमिशन लेने के लिए 335 छात्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। 133 ने सत्यापन करा लिया है। इसमें से अभी तक सिर्फ 20 छात्र-छात्राओं ने ही एडमिशन लिया है। हालात यह हैं कि भाजपा नेताओं तक ने अपने बच्चो का एडमिशन इस यूनिवर्सिटी में नहीं कराया। अब प्रबंधन ने 23 टीचिंग फैकल्टी (अतिथि विद्वानों) को टारगेट थमा दिया है। धमकी दी है कि यदि एडमिशन नहीं लाए तो नौकरी चली जाएगी। बेचारे टीचिंग फैकल्टी (अतिथि विद्वान) कॉलेज कॉलेज घूम रहे हैं। आधिकारिक बयान में हिंदी विवि के रजिस्ट्रार डॉ. एके पारे का कहना है कि शिक्षकों को आदेश नहीं दिए गए हैं। उनसे स्वेच्छानुसार जाने का अनुरोध किया गया है। 

हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी से ज्यादा हिंदू की चिंता
मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने हिंदी विश्वविद्यालय की शुरूआत बड़े ही गर्व के साथ की थी। हिंदी को लेकर बड़ी बड़ी बातें की गईं थीं परंतु रेत का घर रात में ही गायब हो गया। मध्यप्रदेश के एकमात्र हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी का एक भी ऐसा प्रतिष्ठित नाम पदस्थ नहीं है जो हिंदी की पहचान हो। यहां हिंदी से ज्यादा हिंदू की बातें होतीं हैं। हिंदू हितों की चिंता करने वाले ठेकेदार यहां अक्सर मिल जाते हैं। 

एडमिशन लाने की जिम्मेदारी किसकी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ाने की जिम्मेदारी किसकी है। विश्वविद्यालय में एडमिशन लाने की जिम्मेदारी किसकी है। अतिथि विद्वानों से अनुरोध करने से पहले रजिस्ट्रार डॉ. एके पारे खुद क्यों नहीं निकल गए संपर्क करने। विश्वविद्यालय के कुलपति, रजिस्ट्रार और दूसरे बड़े पदाधिकारी इसके लिए अभियान क्यों नहीं चलाते। 

PPP मॉडल पर चलाइए
विश्वविद्यालय प्रबंधन पूरी तरह से फेल साबित हो चुका है। 1200 सीटों के लिए 20 एडमिशन यह प्रमाणित करते हैं कि जिम्मेदारी पदाधिकारी अयोग्य हैं। अब यदि हिंदी की लाज बचानी है तो इसे पीपीपी मॉडल पर चलाया जाना चाहिए। गारंटी दी जा सकती है कि सत्र 19-20 में 1200 सीटों के लिए 2000 से ज्यादा आवेदन आएंगे। 
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