क्या सच में हर घर में बिजली पहुंचेगी ? | EDITORIAL

02 May 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। कर्नाटक में ही सही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह मान लिया है कि “गाँव तक नहीं हर घर तक” बिजली पहुंचना चाहिए। इसका लाभ दक्षिण नही पूरे देश में होगा, बशर्तें यह पूरा हो। 2019 के आम चुनावों के लिए कर्नाटक ‘ट्रेंड सेटर’ राज्य है। यही कुछ कारण हैं कि नेशनल मीडिया अब कर्नाटक की हवा सूंघने के लिए इकट्ठा है और वहां किये गये वादे देश में गूंजेगे।

वैसे एक विधानसभा की चुनावी जीत-हार का बहुत मतलब नहीं है कि कौन जीता है, लेकिन 2019 के परिप्रेक्ष्य में मतलब इस बात से है कि जीतने वाली पार्टी वादों पर कितनी खरी उतरी है?  भाजपा के लिए जिसकी कई राज्यों में सरकारें और देश को कांग्रेस विहीन करने जैसे बड़े लक्ष्य को उसने  निर्धारित किया है। उसके लिए जरूरी है कि वो और प्रधानमंत्री हर बात को तौल कर  बोले। इन चुनावों में प्रधानमंत्री भाजपा के स्टार प्रचारक भी होते हैं। कांग्रेस यह माहौल बनाने में सफल हो जाती है कि प्रधानमंत्री वादे ज्यादा करते हैं। बिजली का  संदर्भ में राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा हैं, यह कर्नाटक ही नहीं अन्य राज्य जहाँ विधानसभा चुनाव होने हैं मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है।

जहाँ तक बात कर्नाटक की है क्षेत्रीय असमानता खतरे की तरह कर्नाटक के इर्दगिर्द मंडरा रही है और जिसे मजबूत-एकीकृत प्रयास से ही दूर किया जा सकता है। लोग बेंगलुरु को बढ़ती भीड़ की आपाधापी से बचाने के लिए चिंतित हैं। दोनों ही चिंताओं के सूत्र आपस में जुडे़ हैं। एक तरफ बड़े-बड़े औद्योगिक हब वाले महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य हैं, जबकि कर्नाटक की उद्यमिता का अधिकांश हिस्सा बेंगलुरु या इसके इर्दगिर्द ही सिमटकर रह गया है। ऐसे में, राज्य के कुछ अन्य इलाकों में भी नौकरी और रोजगार की संभावनाओं के साथ वैकल्पिक केंद्र विकसित करने पर काम हो, तो कर्नाटक और अधिक संतुलित विकास का गवाह बन सकता है। कृषि क्षेत्र में भी ज्यादा ध्यान देकर शोध कराए जाएं, तो कहीं बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं।

कर्नाटक के बहाने से सरकार को अन्य राज्यों सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और सार्वजनिक संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार जैसी इनकी चिंताओं पर भी गौर करने की जरूरत है। कुछ और भी महत्वपूर्ण बातें होंगी, जहां तक सरकार नजर भी शायद न पहुंची हो, पर मतदाता जानता है  । राष्ट्रीय मीडिया के लिए कर्नाटक का यह चुनाव  सिर्फ इन चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण है ऐसा नहीं है ,  इससे  पूरे देश में झाँका जा सकता है जैसे इस राज्य में रहने वाले लाखों लोगों के लिए तो यही ज्यादा महत्वपूर्ण है कि दो चुनावों के बीच क्या-क्या होता है? हर राज्य को उत्कंठा है कि विधान सभा और लोक सभा चुनावों के बीच केंद्र क्या कर सकता था और क्या किया है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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