सरकारें वित्तीय निगहबानी से घबराती क्यों हैं ? | EDITORIAL

Friday, March 9, 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। वैसे तो हर देश में कारोबारी धोखाधड़ी के मामले होते लेकिन भारत में इनकी गति और प्रकार अलग है। भारत में ये हमेशा वित्तीय तंत्र की नाकामी या नियामकीय खामियों की वजह से होते हैं और  कारोबारी इनका फायदा उठाते हैं। सन १९५७  में सामने आए १.२६ करोड़ रुपये के हरिदास मूंदड़ा-जीवन बीमा निगम घोटाले (स्वतंत्र भारत का पहला घोटाला) से सन १९९२  में हर्षद मेहता-स्टेट बैंक के ४००  करोड़ रुपये के घोटाले (उदारीकरण के बाद का पहला घोटाला) और सन २०१८  में नीरव मोदी- पंजाब नैशनल बैंक मामले तक यहीसच सामने आ  रहा है की देश के वित्तीय तन्त्र में गडबडी है और उसे सुधारने को कोई तैयार नही है। 

1992 के पहले के दौर तक हमारी  अर्थव्यवस्था बंद थी। तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी ने एक विफल कारोबारी मूंदड़ा की विफल कंपनियों के शेयर खरीदने के लिए सरकारी कंपनी एलआईसी का इस्तेमाल किया। मूंदड़ा घोटाले की कुछ बातें ध्यान देने लायक हैं। पहली बात तो यह कि नेहरू ने अपने दामाद फिरोज गांधी द्वारा इस घोटाले का खुलासा किए जाने के बाद बहुत तेजी से कार्रवाई की। उनके द्वारा नियुक्त एक सदस्यीय जांच आयोग ने २४ दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश कर दी। इसकी सुनवाई सार्वजनिक रूप से की गई। 

अब न तो ऐसा सोचा जा रहा है न दूर तक इसकी कोई सम्भावना ही दिखती है। मूंदड़ा ने एल आई सी के वित्तीय ढांचे में सेंध लगाई तो हर्षद मेहता ने भारत के सार्वजनिक जीवन को कुछ लुभावने शब्द दिए। उदाहरण के लिए रेडी फॉरवर्ड डील। इसके ठीक २६  साल बाद नीरव मोदी ने लेटर ऑफ अंडरटेकिंग और नास्त्रो अकाउंट जैसे शब्दों को के बीच चर्चा का विषय बनाया। मेहता ने बैंकिंग प्रणाली में कंप्यूटरीकरण की कमी का फायदा उठाया और सरकारी बैंकों से धन जुटाया। प्रमुख तौर पर उसने स्टेट बैंक की मदद ली लेकिन अन्य बैंक भी बच नहीं सके। वहीं नीरव मोदी ने देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक पीएनबी द्वारा दो कारोबारी प्लेटफार्म के बीच सामंजस्य न बनाने का फायदा उठाया और जमकर पूंजी बनाई। 

बैंकिंग नियामक अपने मूलभूत काम यानी बैंकों के नियमन के क्रम में धीमी गति से काम करता है। नई पीढ़ी के निजी बैंक ग्लोबल ट्रस्ट के मामले से इसे समझा जा सकता है जो सन २००४  में नाकाम हो गया था। इसके पीछे अनियमित ऋण व्यवहार उत्तरदायी था। बैंक से कर्ज लेने वालों में केतन पारेख भी शामिल थे। सेंट्रल बैंक को इस बारे में २००१   से ही पता था लेकिन उसने तब कदम उठाया जब हालात हाथ से निकल गए। सबसे पहले उसने तीन महीने का ऋण स्थगन लागू किया। इससे बैंक की शाखाओं में जमाकर्ताओं की भीड़ लगने लगी क्योंकि वे घबराए हुए थे। बाद में इसका कमजोर सरकारी बैंक ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के साथ विलय कर दिया गया। 

यह देश का पहला ऐसा घोटाला था जिसका वैश्विक असर देखने को मिला क्योंकि गोल्डमैन सैक्स और इंटरनैशनल फाइनैंस कॉर्पोरेशन की हिस्सेदारी ग्लोबल ट्रस्ट में थी और बैंक के अंकेक्षण का काम प्राइसवाटरहाउस के पास था जो दुनिया की चार दिग्गज अंकेक्षण कंपनियों में से एक है। इनसे जुदा सत्यम घोटाला इस मामले में विशिष्ट था कि इसमें सरकार किसी भी तरह शामिल नहीं थी। वास्तव में संप्रग सरकार ने इस मामले में बहुत तेजी से काम किया। उसने तत्काल खोज समिति बनाकर एक खरीदार तलाशा और कंपनी के साथ-साथ भारत की प्रतिष्ठा भी बचाई। राजू की स्वीकारोक्ति के चार महीने के भीतर उसे टेक महिंद्रा को बेच दिया गया।

सत्यम मामले सहित इन मामलों में भारतीय कंपनियों के प्रशासन की उस समस्या की झलक मिलती है जहां वैश्विक कद वाले लोगों से भरा बोर्ड भी जरूरी सावधानी बरतने में नाकाम रहा। ये तमाम घोटाले सरकार के उन मामलों में शामिल होने के उदाहरण हैं जहां उसकी कोई भूमिका ही नहीं है। अगर सरकार इन बातों को नहीं समझना चाहती तो उसे कम से कम बाजार का संदेश तो सुनना चाहिए।जो सरकार न्यस्त स्वार्थवश  सुनना नहीं चाहती।

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