भारतीय सेना के प्रति लचर रवैया: मोदी सरकार को संसदीय समिति ने फटकारा | NATIONAL NEWS

Tuesday, December 19, 2017

नई दिल्ली। राजनीतिक बयानों में भारतीय सेना का जितना उपयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में हुआ है, शायद तब भी नहीं हुआ था जब भारत ने पाकिस्तान को धूल चटा दी थी, बावजूद इसके मोदी सरकार भारतीय सेना को अत्याधुनिक हथियार उपलब्ध नहीं करा रही है। इतना ही नहीं पाकिस्तान और चीन से युद्ध का खतरा होने के बावजूद मोदी सरकार ने सेना को पिछले 60 साल की तुलना में सबसे कम बजट दिया है। यह 1962 के चीन युद्ध के बाद अब तक का सबसे कम बजट है। 

मेजर जनरल बीसी खंडूरी (रिटायर्ड) की अध्यक्षता वाली रक्षा की संसदीय कमिटी ने मंगलवार को सदन के समक्ष दो रिपोर्ट पेश की हैं। इसके अनुसार भारतीय सेना कई मोर्चों पर कार्रवाई के लिए संसाधनों की कमी से जूझ रही है। इनमें सबमरीन, फाइटर जेट, हॉवित्जर्स और हेलिकॉप्टर्स की कमी के साथ नई जेनरेशन की असॉल्ट राइफल, मशीन गन, बुलेट फ्रूफ जैकेट्स और हेल्मेट्स जैसे बेसिक संसाधनों की कमी भी शामिल हैं। 

इसके बावजूद आर्मी, नेवी और वायुसेना आधुनिकीकरण के लिए सरकार से रक्षा बजट में फंड नहीं हासिल कर पा रही हैं। वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए 2.74 लाख के बजट का प्रावधान किया गया है, जो प्रस्तावित जीडीपी का महज 1.56 फीसदी है। 1962 के चीन युद्ध के बाद से यह न्यूनतम है। 

कमिटी ने मिलिटरी के आधुनिकीकरण के लिए जरूरत भर का फंड उपलब्ध नहीं कराने और रक्षा खरीदारी को फास्ट ट्रैक नहीं करने के लिए सरकार की आलोचना की है। इस वित्तीय वर्ष में आर्मी, नेवी और वायुसेना को आधुनिकीकरण की उनकी मांग की तुलना में क्रमशः महज 60, 67 और 54 फीसदी फंड उपलब्ध कराया गया है। कमिटी ने इस बात की आशंका और चिंता जताई है कि फंड की अनुपलब्धता का प्रतिकूल असर सेना के ऑपरेशंस पर पड़ सकता है। 

कमिटी के मुताबिक रक्षा मंत्रालय द्वारा इस फंड को भी ठीक योजना बनाकर खर्च न कर पाना स्थिति को और भी बदतर बना रहा है। कमिटी ने कहा कि फंड का उपयोग नहीं करना रक्षा मंत्रालय की योजनाओं में कमी की ओर इशारा कर रहा है। साथ ही फंड के उपयोग में लगातार असफल होने का परिणाम वित्त मंत्रालय की तरफ से बजट कटौती के रूप में भी देखने को मिल रहा है। 

भारतीय सेना के तीनों विंग संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं जिसका असर रक्षा तैयारियों पर भी पड़ रहा है। उदाहरण के लिए दो मोर्चों पर सशक्त रहने के लिए वायुसेना को कम से कम 45 फाइटर स्क्वॉड्रन्स (हर एक में 18-21 जेट) की जरूरत है। फिलहाल वायुसेना के पास केवल 33 स्क्वॉड्रन्स मौजूद हैं। पुराने जेट्स के रिटायर होने की वजह से 2027 तक इनकी संख्या घटकर 19 और 2032 तक 16 रह जाएगी। 

सरकार ने सितंबर 2016 में 59000 करोड़ रुपये में 36 राफेल फाइटर प्लेन का सौदा किया है। हालांकि यह सौदा भी वायुसेना की अलार्मिंग स्थिति को बेहतर बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। पैनल का कहना है कि पिछले वर्षों में लगातार इस मुद्दे को उठाया जाता रहा है लेकिन अबतक कोई ठोस उपाय नहीं किए गए हैं। इसी तरह नेवी के पास सिर्फ 13 पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं। इनके 17 से 32 साल पुराने होने की वजह से एक बार में संख्या बल की केवल आधी क्षमता का ही इस्तेमाल किया जा सकता है। 

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