इन मामलों में समझौता होने के बाद भी सजाएं दी जातीं हैं

Tuesday, August 8, 2017

दिल्ली हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते एक अहम फैसले में कहा है कि रेप का केस दर्ज होने के बाद अगर आरोपी और पीड़िता के बीच समझौता हो जाए और दोनों शादी कर लें तब भी समझौते के आधार पर केस रद्द नहीं हो सकता। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि समाज के खिलाफ किए गए अपराध के मामले में समझौते के आधार पर केस रद्द नहीं हो सकता। आखिर किन मामलों में समझौते के आधार पर केस रद्द हो सकता है और किन मामलों में नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर क्या व्यवस्था दी हुई है, ये जानना जरूरी है।

समझौतावादी और गैर समझौतावादी अपराध: 
कानूनी जानकार बताते हैं कि अपराध दो तरह से होते हैं समझौतावादी और गैर समझौतावादी। समझौतावादी अपराध आमतौर पर हल्के किस्म के अपराध होते हैं। गैर समझौतावादी मामले गंभीर किस्म के अपराध होते हैं। सीनियर एडवोकेट केके मनन बताते हैं कि सीआरपीसी की धारा-320 के तहत उन अपराध के बारे में बताया गया है जो समझौतावादी होते हैं। 3 साल तक की सजा वाले ज्यादातर मामले समझौतावादी हैं। इसमें कुछ अपवाद भी हैं। समझौतावादी अपराध में धमकी देना, मामूली मारपीट, जबरन रास्ता रोकने और आपराधिक मानहानि जैसे मामले आते हैं। ऐसे मामले में अगर शिकायती और आरोपी के बीच समझौता हो जाए और वे चाहते हैं कि केस खत्म किया जाना चाहिए तो इसके लिए समझौता करने के बाद कोर्ट (जिस कोर्ट में मामला पेंडिंग है) को सूचित किया जाता है कि समझौता हो चुका है ऐसे में कार्रवाई खत्म की जाए और फिर केस को अदालत खत्म कर देती है। इसी कैटिगरी में कुछ ऐसे भी अपराध हैं, जिसमें कोर्ट की इजाजत से केस रद्द होता है। चोरी, धोखाधड़ी और जख्मी करने जैसे मामलों में कोर्ट की इजाजत से ही केस रद्द हो सकता है।

हाई कोर्ट में सीआरपीसी की धारा-482 का इस्तेमाल: 
गैर समझौतावादी मामले में हाई कोर्ट की इजाजत से ही केस रद्द हो सकता है। हाई कोर्ट के सरकारी वकील संजय लॉ बताते हैं कि दरअसल जब भी कोई अपराध होता है तो क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में ये माना जाता है कि अपराध किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि समाज के खिलाफ होता है। इसी कारण आरोपी बनाम स्टेट का केस होता है। पीड़ित पक्ष की ओर से स्टेट होती है और तब गैर समझौतावादी केस जो गंभीर किस्म के अपराध माने गए हैं, उसमें पीड़ित पक्ष के साथ आरोपी अगर समझौता कर भी ले तो केस तब तक रद्द नहीं हो सकता जब तक हाई कोर्ट इसके लिए आदेश पारित न करे। दरअसल गैर समझौतावादी केसों में हाई कोर्ट में सीआरपीसी की धारा-482 और अनुच्छेद-226 के तहत अर्जी दाखिल की जाती है और कोर्ट से कहा जाता है कि आरोपी का शिकायती के साथ समझौता हो चुका है और ऐसे में केस रद्द किया जाना चाहिए। गैर इरादतन हत्या के प्रयास, दहेज प्रताड़ना आदि गैर समझौतावादी मामलों में दोनों पक्षों में समझौता हो जाए तो हाई कोर्ट में केस रद्द करने की गुहार लगाने का प्रावधान है। हालांकि इस दौरान हाई कोर्ट ये देखती है कि क्या मामले में और कोई गवाह है या नहीं कोई साइंटिफिक साक्ष्य है या नहीं।

ज्ञान सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था: 
गैर समझौतावादी केसों में हत्या, डकैती और रेप जैसे मामले को अपवाद माना गया है। हाई कोर्ट में भारत सरकार के वकील अजय दिग्पाल बताते हैं कि ज्ञान सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब के वाद में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दे रखी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट को सीआरपीसी की धारा-482 में क्रिमिनल केस रद्द करने का अधिकार है। हत्या, रेप और डकैती तो दोनों पक्षों से समझौते के आधार पर केस रद्द नहीं हो सकता। क्योंकि ये अपराध व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि समाज के खिलाफ किया गया अपराध है।

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