भारत: दोस्ती में भी साम्प्रदायिकता

Sunday, April 9, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। विपरीत लिंग के आकर्षण को यदि अलग गिने तो आज भी भारत में ज्यादातर लोग अपने मजहब के भीतर ही दोस्त बनाते हैं। ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डिवेलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) के एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश के 91 प्रतिशत हिंदुओं के नजदीकी दोस्त उनके अपने समुदाय से ही होते हैं। इनमें एक तिहाई ही ऐसे हैं, जिनकी दोस्ती मुस्लिम समुदाय के लोगों से भी है। सर्वे में 74 प्रतिशत मुस्लिमों ने कहा कि उनकी हिंदुओं से नजदीकी दोस्ती है, जबकि 95 प्रतिशत मुसलमानों के करीबी दोस्त मुसलमान ही हैं।

भारत जैसे समाज में, जहां बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ मुस्लिम, ईसाई और सिख जैसे अल्पसंख्यक भी रहते हों, यह सर्वेक्षण सामाजिक ताने-बाने के बारे में बहुत कुछ कहता है। यह सामाजिक विकास की पड़ताल भी करता है। अगर बहुसंख्यक समाज का करीब एक तिहाई हिस्सा ही अल्पसंख्यकों से अच्छी तरह घुला-मिला है, तो यह इस बात का संकेत है कि समाज में आपसी आवाजाही आज भी बहुत कम है।

दरअसल भारत ने आजादी मिलने के बाद अपना सफर भारी संदेह और वैमनस्य के माहौल में शुरू किया था। जरूरत धीरे-धीरे इसे सामान्य बनाने की थी। अगर देश स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों पर चलता रहता तो यह लक्ष्य हासिल हो सकता था। लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने अपने फायदे के लिए सांप्रदायिकता का हर संभव इस्तेमाल किया, जिससे हिंदू-मुसलमानों के करीब आने की प्रक्रिया कमजोर पड़ी। गांवों-कस्बों में जो सामाजिक-आर्थिक आदान-प्रदान चला आ रहा था, उसमें तनावों के बावजूद कोई खास कमी नहीं आई, पर शहरों में दूरी बढ़ती गई।

असुरक्षा एक बड़ा तत्व रहा, जिसके चलते मुसलमानों में अपने समूह से बाहर न निकलने की प्रवृत्ति बढ़ी। बहुसंख्यक समुदाय आगे बढ़कर उनसे संवाद कर सकता था। उन्हें अपने बीच रहने को प्रेरित कर सकता था। पर उसने ऐसा नहीं किया। मुसलमानों को सरकार से भी ऐसा कोई प्रोत्साहन नहीं मिला कि वे अपने पारंपरिक पेशों से निकलकर मध्यवर्गीय दायरे में आएं और दूसरे समुदायों से उनका संपर्क बढ़ सके। दुर्भाग्य से आपसी संदेह और अविश्वास लगातार बढ़ता रहा है, जिसमें मीडिया का भी बड़ा योगदान है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लगातार मुसलमानों की एक बंधी-बंधाई छवि प्रस्तुत कर रहा है। भाषा से लेकर रहन-सहन तक भारी तब्दीली मुस्लिम समुदाय में भी आई है, लेकिन हिंदुओं के काफी बड़े हिस्से के मन में उनकी पारंपरिक छवि ही बैठी हुई है, जिसके मुताबिक आम मुसलमान बेहद पिछड़ा और अतीतजीवी है। हमें इस सर्वेक्षण को एक चुनौती के रूप में लेना होगा। सामाजिक सौहार्द की बात करना आसान है, लेकिन इसे जमीन पर उतारने के लिए हर किसी को अपनी तरफ से कुछ करना होगा।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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