वर्तमान राजस्थान के अलवर शहर से करीब 3 किमी दूर स्थित एक गांव का संबंध लंकापति रावण से बताया जाता है। कहते हैं कि रावण, माता मंदोदरी के साथ जब प्रवास पर थे तब यहां एक गुफा में उन्होंने रात्रि विश्राम किया और प्रातः शिवलिंग का अभिषेक करने के बाद भोजन ग्रहण किया था।
एक बार रावण, लंका के राजा, अपनी पत्नी मंदोदरी के साथ एक दूर के स्थान पर जा रहा था। सुबह के भोजन का समय होने के कारण वे अलवर के पास रुक गए। रावण भगवान की पूजा करने के बाद ही भोजन ग्रहण करता था, लेकिन यहां तो भगवान शिव की कोई प्रतिमा ही नहीं थी। तब मंदोदरी ने रेत का शिवलिंग बनाकर स्थापित किया।
बाद में रावण ने कारीगरों को भेजकर उस चट्टान पर नक्काशी करवाई एवं क्षेत्र को व्यवस्थित किया। ताकि माता मंदोदरी द्वारा निर्मित बालू के शिवलिंग, लंबे समय तक सुरक्षित रहें। जिसे बाद में लोगों ने, रावण द्वारा निर्मित भगवान शिव का मंदिर बताया। रावण देहरा मे बना यह प्राचीन मंदिर 15 वीं शताब्दी तक स्थापित रहा।
रावण देहरा गांव प्रतापबंध से आगे करीब दो किलोमीटर दूर है । यहां के ग्रामीण कहते हैं कि राजा चकवाबेन से युद्ध करने के लिए आए रावण ने यहां रावण देहरा में डेरा डाला। इसलिए इस गांव का नाम रावण देहरा पड़ा। राजा चकबावेन ने रावण का अहंकार तोड़ दिया था।
दूरी - उदयपुर से 542 किमी. जयपुर से 172 किमी.दूर है। अलवर से 115 किमी.दूरी पर है।

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