राकेश दुबे@प्रतिदिन। खादी और ग्रामोद्योग आयोग के इस सुझाव पर केंद्र सरकार गंभीरता से विचार कर रही है कि हर शुक्रवार अगर सरकारी कर्मचारी खादी के कपड़े पहनें| प्रश्न यह है कि क्या इससे देश के खादी और ग्रामोद्योग से जुड़े लोगों को बहुत फायदा हो सकता है? सरकार का सोचना है कि इसको अनिवार्य करने से बेवजह का विवाद हो सकता है, इसलिए सरकार इसे स्वैच्छिक बनाने पर विचार कर रही है।केंद्र सरकार के कर्मचारियों की संख्या रेलवे और सेना के कर्मचारियों को छोड़कर ३५ लाख के करीब है, अगर ये सभी एक-एक जोड़ी खादी के वस्त्र भी खरीद लें, तो खादी और ग्रामोद्योग आयोग को बड़ा फायदा होगा।
कहने को कर्मचारी खादी पहनते, लेकिन इसमें एक वर्ग भेद है। सरकारी कर्मचारियों में आला अफसर खादी या हैंडलूम के ऊंचे ब्रांड के कपड़े पहने मिल जाएंगे, लेकिन मंझले या निचले स्तर पर इनकी तादाद सिर्फ उन कर्मचारियों में दिखेगी जिन्हें सरकार ने इसे वर्दी के रूप में दिया है | आजादी के आंदोलन के सभी कांग्रेसी नेता अपने हाथों से सूत कताई करते थे और खादी ही पहनते थे। आजादी के बाद भी लंबे वक्त तक कांग्रेसजनों के लिए खादी पहनना अनिवार्य था। अब खादी से जुड़ा यह इतिहास वक्त के साथ बदल गया है अब कांग्रेस में भी खादी का उपयोग फैशन की तरह हो गया है | अन्य दल तो पहले से ही परहेज बरतते रहे हैं |
अभी भी खादी का काम करने वाले लोग समाज में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के ही हैं और खादी का इस्तेमाल बढ़े, तो इन्हें फायदा होगा। वैसे अब खादी पहनना फैशन में नहीं है और आधुनिक तकनीक से बने वस्त्र खादी के मुकाबले सस्ते और सुविधाजनक भी हैं, इसलिए खादी पहनना काफी कम हो गया है। जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बदलेगी, वैसे-वैसे खादी की अर्थव्यवस्था भी बदलेगी। खादी को प्रोत्साहन देने के पीछे अवधारणा यही थी कि भारत के सीमांत या भूमिहीन किसान परिवारों को खादी से कुछ अतिरिक्त कमाई हो जाए। जैसे-जैसे शहरीकरण होगा और रोजगार के अन्य साधन बढ़ेंगे, ऐसे परिवारों की संख्या कम होगी। शायद तब खादी का अर्थ बदल जाए।
- श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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