भोपाल। आरक्षण के विषय पर देश एक बार फिर लामबंद हो रहा है। समर्थन और विरोध दोनों जारी हैं। इस बीच मप्र हाईकोर्ट ने एक मामले में निर्णय सुनाते हुए आदेशित किया है कि प्रमोशन के विषय में आरक्षण का कोई औचित्य ही नहीं है। यह कतई नहीं होना चाहिए।
मामला मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि अनारक्षित वर्ग के पदों के विरुद्ध आरक्षित वर्ग के अफसरों को प्रमोशन नहीं दिया जाए। कंपनी में सीजीएम (करंट चार्ज) एमएस यादव की याचिका पर 3 नवंबर को पहली ही सुनवाई में जस्टिस आलोक अराधे ने ये आदेश दिए। यह इसलिए भी अहम है कि हाईकाेर्ट में ऐसी आधा दर्जन याचिकाएं लंबित हैं।
यादव ने पांच महीने पहले यह याचिका दायर की थी। उन्होंने कंपनी प्रबंधन द्वारा सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर से एडीशनल सीई के पद पर प्रमोट मनीषा मेश्राम के प्रमोशन को चुनौती दी थी। याचिका में दो अन्य सुपरिंटेंडेंट इंजीनियरों अशोक जाटव और दिलीप सिंह धुर्वे का ग्रेडेशन लिस्ट में नाम होने को भी आधार बनाया गया था।
यादव ने याचिका में दलील दी कि अनारक्षित वर्ग के पदों के विरुद्ध ऐसे ही प्रमोशन दिए जाते रहे तो अगले साल तक एडीशनल चीफ इंजीनियरों के 10 पद आरक्षित वर्ग के अफसरों से ही भरे जाएंगे। यह अनारक्षित वर्ग के अफसरों के साथ नाइंसाफी होगी। उनका हक मारा जाएगा।
जस्टिस अराधे ने अपने आदेश में प्रमोशन में आरक्षण संबंधी उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित नागराज केस का भी उल्लेख किया है। मप्र शासन समेत बिजली कंपनी के एमडी और सीजीएम एचआर को इस बारे में आदेश जारी किए गए हैं।

