राकेश दुबे@प्रतिदिन। पहले छत्तीसगढ़ और अब उत्तरप्रदेश में चपरासी के पद के लिये आवेदन अनेक प्रश्न खड़े करते हैं। बड़ी संख्या में शिक्षित बेरोजगारी हमारी शिक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिह्न है। हमारी शिक्षा हमें हुनरमंद नहीं बनाती है। आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में जो विकास हुआ, उसमें भी युवकों के लिए सम्मानजनक रोजगार के अवसर पैदा नहीं हुए। जब लोगों के पास रोजगार और जेब में पैसा नहीं होगा, तो गोदामों में अनाज होते हुए भी लोग खाली पेट रहेंगे। भयंकर बेरोजगारी और गरीब-अमीर के बीच बढ़ती यह खाई असंतोष को जन्म दे रही है।
देश ने अब तक दो प्रमुख विचारों की सरकार देख ली | राज्यों में तो हर दल हाथ आजमा चुका है, हर विचारधारा की सरकार लोगों ने देख ली है। राजनीतिक दलों के पास लुभावने नारे तो हैं, पर उनके आधार पर सरकार की नीतियां बनाकर उनके लिए वित्तीय प्रबंध की क्षमता पार्टी संगठन में नहीं है। नतीजतन सरकार में आने पर वे नीतियां और कार्यक्रम बनाने का काम अफसरों पर छोड़ देते हैं। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, देशी- विदेशी कंपनियां, ठेकेदार और सेल्समैन इसका फायदा उठाते हैं। नतीजा है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल को निजी क्षेत्र की मुनाफाखोरी के लिए खुला छोड़ दिया गया है। जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा ऐसी योजनाओं में ज्यादा लगता है, जहां से कमीशन की गुंजाइश ज्यादा हो। मुलायम, लालू, नीतीश, मायावती, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, अखिलेश और नरेंद्र मोदी जैसे लोग भी इस रीति-नीति में रच-बस गए, जो कहने को गांव और गरीबी का प्रत्यक्ष अनुभव रखते हैं।
नतीजतन करोड़ों लोगों को रोजगार देने की क्षमता रखने वाला कृषि और कुटीर उद्योग तबाह है। दूसरे छोटे-बड़े कल-कारखाने भी कराह रहे हैं। चीन, कोरिया अथवा मलयेशिया का सामान बेचने में कितने लोग खपेंगे और दुनिया हमारे कितने कंप्यूटर इंजीनियरों को रोजगार देगी? या कितने लोग बैंक, इंश्योरेंस, परिवहन या पर्यटन व्यवसाय में लगेंगे? अगर बेरोजगार युवा निराश हुए, तो हमारी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो सकता है। रोजगार जरूरी है और अपनी जगह पर , सोचिये |
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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