नागरवाला कांड की याद दिला रहा है व्यापमं

Updesh Awasthee
रवीन्द्र वाजपेयी। व्यापमं घोटाले के दो आरोपियों की मौत से संदेह के बादल और गहरा गये हैं। इनमें एक जेल में रहते हुए चल बसा वहीं दूसरा जेल के बाहर। दोनों की मृत्यु अचानक हुई। इंदौर जेल में इलाज के बाद नरेन्द्र सिंह तोमर को अस्पताल ले जाया जा रहा था तब रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। वहीं दूसरी मौत डा. राजेन्द्र आर्य की हुई जो जमानत पर थे। निजी कार्यवश राजस्थान के कोटा नगर गये राजेन्द्र की तबियत बिगड़ी और वे चल बसे। इन दोनों को मिलाकर व्यापमं घोटाले में मरने वालों की संख्या 41 हो गई है।

व्यापमं घोटाले की गुत्थी जिस तरह उलझती जा रही हैं उससे एक बात तो स्पष्ट हो गई कि उसका नेटवर्क काफी मजबूत था। ये कहना भी पूरे तौर पर सही होगा कि इसका दायरा मप्र के बाहर तक फैला रहा तथा उसका संचालन पूरी तरह से पेशेवर अंदाज में किया जाता था। निश्चित रूप से इतना बड़ा कारोबार बिना राजनीतिक, प्रशासनिक संरक्षण और सहायता के नहीं हो सकता। व्यापमं की जांच जिस गति से चल रही है उसे देखते हुए कह पाना कठिन होगा कि वह कब तक पूरी हो पायेगी?

कई बार इस घोटाले के साथ जुड़ती जा रही घटनाओं को देखते हुए सत्तर के दशक में दिल्ली में हुए नागरवाला कांड की स्मृतियां सजीव हो उठती हैं। हुआ यूं कि एक राष्ट्रीयकृत बैंक में सरकारी खाते से 60 लाख रु. नगद निकाल लिये गये किन्तु इसके लिये किसी चैक का उपयोग करने की बजाय सफाई दी गई कि बैंक प्रबंधक को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फोन पर वैसा करने कहा था।

नागरवाला नामक जिस व्यक्ति ने वह बड़ी रकम निकाली उसको लेकर आज तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। शुरू में उसे एक शातिर अपराधी माना गया परन्तु धीरे-धीरे संदेह की सुई श्रीमती गांधी और उनसे जुड़े कुछ निकटस्थों की तरफ भी घूमने लगी। जांच शुरू हुई और लंबी खिंची। उस दौरान नागरवाला, बैंक प्रबंधक तथा कुछ अन्य गवाहों की मौत एक के बाद एक होती गई। कोई ट्रक से कुचल गया तो कोई घर में संदिग्ध हालत में मृत पाया गया। उस कांड को पांच दशक हो गये परन्तु आज तक कोई नहीं जान सका कि वास्तविकता थी क्या?

व्यापमं घोटाला भले ही उतना पुराना नहीं हुआ तथा उसका आकार-प्रकार नागरवाला कांड से हजारों गुना बड़ा है परन्तु उसकी जांच भी इसी तरह चलती रही तो बड़ी बात नहीं वह किसी निष्कर्ष तक न पहुंच सके और पहुंचे भी तो हासिल कुछ न हो।

लेखक श्री रवीन्द्र वाजपेयी जबलपुर से प्रकाशित मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस के संपादक हैं।

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