राकेश दुबे@प्रतिदिन। आर्थिक और सामाजिक विषमता को समान्त में बदलने के उद्देश्य को लेकर शुरू हुआ नक्सलवाद अब अपनी रह बदल चुका है| सरकार आये दिन अलर्ट पर रहती है| संवाद या प्रतिरोध की कोशिशें फलवती नहीं हो पा रही हैं| अब फिर “सलवा जुडूम” अर्थात शांति यात्रा प्रारभ होने जा रही है|
“सलवा जुडूम” के रचनाकार महेंद्र कर्मा की पुण्यतिथि आ रही है| 25 मई को झीरम घाटी में होने वाले एक कार्यक्रम के दौरान इस अभियान को फिर से शुरू करने की घोषणा की जा सकती है| उनके बेटे छविंद्र कर्मा की माने तो जागरूकता के अभाव के चलते बस्तर में नक्सली समस्या लगातार बढ़ रही है। तमाम गांवों में नक्सलियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है जो कानून और व्यवस्था के लिए खतरनाक है| कम्युनिस्ट नेता रहे महेंद्र कर्मा ने कांग्रेस में शामिल होने के बाद ‘सलवा जुडूम’ अभियान की शुरुआत की थी| इस अभियान का राज्य सरकार की ओर मदद भी मिलती है|
माओवादी ‘सलवा जुडूम’ से काफी नाराज हैं| वे तो इसे खूनी संघर्ष बढ़ाने वाला अभियान बताते हैं |हुआ भी कुछ ऐसा ही था| नाराज नक्सलियों ने 2013 की 25 मई को झीरम घाटी में घात लगाकर कांग्रेस नेताओं पर हमला किया था| इस खौफनाक हादसे में 28 लोगों की मौत हो गई थी| इनमें से एक महेंद्र कर्मा भी थे| हमले के दौरान नक्सली ‘महेंद्र कर्मा मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे|
‘सलवा जुडूम’ एक आदिवासी शब्द है जिसका मतलब होता है- ‘शांति का कारवां’. इस अभियान में ग्रामीणों की सेना तैयार की जाती है ग्रामीणों को हथियार चलाने का विशेष प्रशिक्षण पुलिस देती है| ग्रामीणों को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाया जाता था, ताकि वे नक्सलियों से लोहा ले सकें। इसके लिए ग्रामीणों को 1500 से 3000 रुपये तक का भत्ता भी दिया जाता है| साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार को आदिवासियों को एसपीओ बनाने और उन्हें माओवादियों के खिलाफ हथियारों से लैस करने से रोक लगा दी थी| कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया था|
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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