उपदेश अवस्थी/लावारिस शहर। मोदी इन दिनों एक ऐसा जादूई नाम हो गया है जो जिसके साथ जुड़ जाए वो नेशनल डोमेन में चर्चा का विषय बन ही जाता है। इन दिनों द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद एवं जबलपुर के एक पत्रकार महोदय चर्चा का माध्यम बन गए हैं।
हुआ यूं कि पिछले दिनों द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद को अखबारों में छपने का मन हुआ सो पत्रकारों को आमंत्रित कर लिया गया। उन्होंने तसल्ली के साथ अपनी ब्रीफिंग दी और कुछ सवालों के जवाब भी। इसी दौरान एक पत्रकार ने पूछ लिया 'नरेन्द्र मोदी और अरविंद केजरीवाल में सबसे बेहतर पीएम कौन होगा।' पता नहीं इस सवाल में कौन से कांटे थे जो शंकाराचार्य को लग गए और वो तमतमा उठे। उन्होंने पत्रकार को थप्पड़ तक जड़ दिया।
बस इसी थप्पड़ के साथ यह मामला पूरे देश भर में गूंज गया।
इसलिए नहीं गूंजा कि भारत की पत्रकार बिरादरी ने साधू समाज के बहिष्कार का फैसला लिया हो या दोनों बिरादरियां आमने सामने आ गईं हों।
इसलिए भी नहीं गूंजा कि एक शंकाराचार्य जो क्षमा और शांति का प्रतीक होता है आखिर तमतमा कैसे गया। उसे गुस्सा क्यों आया और यदि वो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख सकता तो क्यों ना उसे शंकाराचार्य पद से मुक्त कर दिया जाए।
बल्कि इसलिए गूंजा क्योंकि उसमें नरेन्द्र मोदी जुड़े हैं। इस थप्पड़ के साथ शंकाराचार्य का मोदी के प्रति तीव्र विरोध सामने आया है। कांग्रेस इसे कैश कराना चाहती है और बीजेपी बैकफुट पर है। कयास लगाए जा रहे हैं कि भारत का साधू समाज मोदी से बहुत खफा है, इतना नाराज कि वो मोदी का नाम तक सुनना नहीं चाहता और शंकाराचार्य जैसा साधू भी अपना नियंत्रण खो बैठता हैं
वैसे खोजने वाला सवाल यह होना चाहिए कि आखिर मोदी ने शंकाराचार्य की ऐसी कौन सी भैंस चुरा ली जो शंकाराचार्य मोदी का नाम सुनते ही बौखला जाते हैं।
