डीटीई की नई नीति: अब गरीब के बच्चे नहीं बन पाएंगे इंजीनियर

shailendra gupta
भोपाल। एक ओर जहां सरकार गरीब छात्रों को उच्च शिक्षित करने के लिए कई कदम उठा रही है। वहीं तकनीकी शिक्षा विभाग (डीटीई) सरकार की इस मंशा पर पानी फेरता नजर आ रहा है। डीटीई द्वारा इस बार अपनाई गई आंशिक शिक्षण शुल्क नीति ने गरीब छात्रों की इंजीनियर बनने की राह में रुकावटें पैदा कर दी हैं।

कॉलेज व सीट मिलने के बाद भी ऐसे हजारों विद्यार्थी हैं जो दाखिले के वक्त पर लिए जा रहे 20 और 10 हजार रुपए का डीडी जमा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में कॉलेज लेवल काउंसलिंग भी इससे प्रभावित होने के आसार पैदा हो गए हैं।

इधर, इंजीनियरिंग कॉलेज प्रबंधन चाहते हुए भी फीस के मामले में छात्रों की मदद नहीं कर पा रहा है। गौरतलब है कि इस बार डीटीई ने इंजीनियरिंग व फार्मेसी कॉलेजों में विद्यार्थियों को एडमिशन लेते समय आंशिक शुल्क जमा करने का प्रावधान रखा है।

इसके अनुसार सामान्य व ओबीसी वर्ग के विद्यार्थियों से 20 हजार तथा एससी- एसटी वर्ग के विद्यार्थियों से 10 हजार रुपए का डीडी जमा कराया जा रहा है। खास बात यह है कि विद्यार्थियों से यह राशि डिमांड ड्राफ्ट के जरिए संचालक तकनीकी शिक्षा विभाग, मप्र के खाते में जमा करवाई जा रही है। एडमिशन टाइम पर इतनी मोटी रकम जमा नहीं कर पाने से कई छात्र दाखिला नहीं ले पा रहे हैं।

किस्तों में लेते थे फीस

गौरतलब है कि इससे पहले कॉलेज संचालकों द्वारा उनसे कई किस्तों में फीस ले लिया करते थे, लेकिन इस बार वे चाहकर भी छात्रों की मदद नहीं कर पा रहे क्योंकि कोई कॉलेज को अगर सीटें भरनी हैं तो उसे लाखों रुपए विभाग को चुकता करने पड़ेंगे।

अधिकांश गरीब छात्र बीई में एजुकेशन लोन की दम पर प्रवेश लेते हैं, लेकिन उन्हें ये लोन दाखिला पुख्ता होने के बाद मिलता है। सूत्रों के मुताबिक इस योजना के पीछे विभाग को होने वाला लाखों रुपए का लाभ बताया जा रहा है।

गौरतलब है कि बीई में करीब 30 हजार विद्यार्थी दाखिला ले चुके हैं। इन विद्यार्थियों से लिए जाने वाले डीडी से विभाग के खाते में अभी तक 30 करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं। यदि ये राशि विभाग के पास एक माह भी जमा रहती है, तो उसे इससे मिलने वाले ब्याज से लाखों का लाभ मिलेगा। डीटीई के संचालक अरुण नाहर से जब इस संबंध में बात करने कॉल किया गया, लेकिन उन्होंने बात करना मुनासिब नहीं समझा।

काउंसलिंग पर भी संकट

डीटीई द्वारा तीन चरणों की काउंसलिंग के बाद कुल 1 लाख 10 हजार सीटों में से सिर्फ 35 हजार सीटें भी भरा सकी हैं। क्वालिफाइंग राउंड में सिर्फ करीब पांच हजार सीटें हीं भरा सकी हैं। अब कॉलेज संचालकों का उम्मीद है कि यदि डीटीई अपनी ये शर्त वापस ले ले तो सीएलसी में अधिक सीटें भर सकती हैं। सूत्रों के मुताबिक सोमवार को भी कुछ कॉलेज के संचालक तकनीकी शिक्षा विभाग पहुंचे, जहां उन्होंने बिना डीडी की शर्त को वापस लेने का प्रस्ताव रखा है।


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