कीर्ति राणा/ कल तक मजबूत जोड़ की तरह संघ ने जिन्हें सीने से चिपका रखा था उन्हीं गडकरी से संघ ने जिस तरह पीछा छुडाया वह संघ की सख्ती कम गडकरी विरोधी नेताओं के दबाव के आगे समर्पण अधिक नजर आता है। आयकर टीम की आज दिन भर चली सक्रियता ने भी इस आग में घी का काम जरुर किया है लेकिन गडकरी की इस विदाई ने कांग्रेस के लिए अब परेशानी भी बड़ा दी है।
राहुल को कांग्रेस उपाध्यक्ष बनाए जाने से उत्साहित-बयानवीर नेताओं के लिए गडकरी साफ्ट टार्गेट थे लेकिन उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की भाजपा में वापसी और अब उसी प्रदेश के राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाए जाने से कांग्रेस के लिए यूपी से लोकसभा चुनाव में अधिक सीटें जीतना सपना ही साबित होगा। रात तक बंद कमरा बैठकों में भाजपा के बड़े नेताओं से चर्चा कर राजनाथ सिंह के नाम पर सहमती बनाई पार्टी विद डिफ़रेंस वाले सूत्र वाक्य से जिस पार्टी का चेहरा दमकता रहा उसमें आज सुबह से अध्यक्ष के चुनाव को लेकर जो घमासान मचा रहा उसमें गडकरी के इस्तीफे और राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाए जाने के संकेत से यह घमासान थम गया सा लगता जरुर है लेकिन यह एक ब्रेक के समान ही है।
राजनाथ के नेतृत्व में भाजपा के चहरे से पूर्ती में फेकें पत्थर से उड़े छींटे जरुर साफ़ हो जाएगे लेकिन राजनाथ के नाम पर फिलहाल सहमति व्यक्त करने वाले नेता अपना मन कितना साफ़ रखेंगे यह ब्रेक के बाद चलने वाली कहानी से साफ़ होगा। राजनाथ सिंह पहले भी भाजपा अध्यक्ष रहे हैं अब जब वे दूसरी बार अध्यक्ष बनाए गए हैं तो यह भी तय लगता है की अब केंद्र सरकार के भर्ष्टाचार को ताकत से उठाएगी।
भाजपा से गडकरी का जाना कुछ हद तक वैसा ही है जैसा मप्र से प्रभात झा का जाना, फिर भी झा ऐसे विवादों में तो नहीं घिरे थे। आडवानी प्रधानमंत्री बने ना बने लेकिन गडकरी के खिलाफ उनका जो रुख रहा उससे पार्टी में उनका कद जितना बड़ा है उतना ही सुषमा स्वराज का आभा मंडल क्षीण हुआ है। इस नाटकीय घटनाक्रम के अंत से किसी को राहत मिली होगी तो वह्बंगारु लक्ष्मण को।
पार्टी में राजनाथ सिंह को कमान मिली जरुर है लेकिन जिस तरह से आम कार्यकर्ता नरेन्द्र मोदी को केंद्र में लाए जाने की मांग करता रहा है उसे देखते हुए तो यही लगता है की मोदी जब भी पार्टी हित में दिल्ली आएँगे अंदरुनी विवाद और तेजी से उभरेंगे। एक तरह से अब भाजपा में मोदी के अलावा पीएम वोटिंग की लाइन में राजनाथ सिंह का नाम भी जुड़ गया है। राजनाथ सिंह का नाम तय कर संघ ने पार्टी में बड़े स्तर पर फ़ैल रही गुटबाजी पर अंकुश लगाने की कोशिश की है। संघ ने जो निर्णय आज लिया इस पर कुछ पहले अमल कर लिया जाता तो मतभेदों की खाई इतनी गहरी नहीं होती।
भारतीय राजनीति में आज का दिन बेहद उथलपुथल वाला साबित हुआ है। हरियाणा में पांच बार मुख्यमंत्री रहे ओमप्रकाश चोटाला, उनके पुत्र अजय, विधायक, आइएएस अफसर सहित बाकी लोगों को कोर्ट के आदेश पर दस-दस साल की सजा सुनाई गई तो इनेलो समर्थकों ने खूब हंगामा किया और आरोप लगाए की सरकार ने चोटाला के खिलाफ जांच एजेंसी का दुरूपयोग किया है। सुबह से यह हंगामा चल रहा था।
दूसरी तरफ भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के पूर्ती समूह से जुड़ी कम्पनियों की सच्चाई जानने के लिए की गई छानबीन की कार्रवाई पर भाजपा खेमे से यह आवाज उठती रही की गडकरी के पुन: अध्यक्ष निर्वाचित होने की कवायद से पहले जानबूझकर यह सब किया गया है। कितना अजीब है जब संघ गडकरी से पल्ला झाड लेता है तब वो मुस्कुराते हुए कहते हैं की मैं तो पार्टी की साख के कारण जा रहा हूँ। उधर चोटाला चिंतन है की यह सब केंद्र में कांग्रेस द्वारा उनसे बदले की कार्रवाई के तहत किया गया है। घपले-घोटालों से काले हुए चेहरे ऐसे सारे नेताओं को इसलिए नजर नहीं आते क्यों की उन्हें लगता है उनके हाथ तो सफेदझक हैं।