संघ के रिमोट की बैटरी से भाजपा नहीं हो सकी रीचार्ज

shailendra gupta
प्रसंगवश/देव श्रीमाली/बीते एक  साल से माना जा रहा था कि नितिन गडकरी भाजपा के लगातार दूसरी बार राष्ट्रीय  अध्यक्ष चुने जायेंगे । इसके पीछे उनकी ताकत थी । वह ताकत जिसके बारे में माना जाता है कि भाजपा को उसी शक्तिपुंज द्वारा रिमोट के जरिये संचालित किया जाता है। इसी रिमोट के जरिये महाराष्ट्र के एकदम अज्ञात  से नेता नितिन गडकरी अचानक भाजपा की सियासत की न केवल राष्ट्रीय स्क्रीन पर आ गए थे बल्कि उसके सिरमौर भी बन बैठे थे। 

यह एकदम अजूबा ही था कि एक ऐसा व्यक्ति जो कभी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति का सदस्य तक न रहा हो और जिसने पहली बार दिल्ली की शक्ल तब ही देखी  हो जब वह देश  में दूसरे  नंबर की बड़ी  पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर पहुंचे। लेकिन यह शक्तिपुंज की अपनी रणनीति का हिस्सा था। वह भाजपा के लोगों को ही नहीं पूरे देश को अपनी ताकत का अहसास करना चाहता था। एक ही निर्णय के जरिये वह अपनी और कथनी के अंतर को मूक होकर जताना चाहता था कि वह जो कहता है वह सच नहीं है। संघ के लोग गाहे बगाहे कहते रहते हैं कि भाजपा से उसका कोई लेना -देना नहीं है। भाजपा स्वतंत्र रूप से काम करती है। 

लेकिन लाल कृष्ण आडवाणी के विरोध के बावजूद संघ ने गडकरी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर न केवल बिठवा दिया था बल्कि उनके नेतृत्व में ही नए लोकसभा चुनाव हो सकें इसके लिए पार्टी के संविधान तक में संशोधन करवा दिया गया था । भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के कुछ घंटो पहले तक सब मानकर चल रहे थे कि दिल्ली में गडकरी को दुबारा अध्यक्ष बनाने की सिर्फ औपचारिक घोषणा मात्र होना है ।लेकिन कुछ ही घंटो में सब कुछ बदल गया और परिस्थितियों से उपजे निर्णय ने सबको चौंका दिया । 

गडकरी के हाथों से पार्टी ने धकियाकर जिस तरह से कमान छीनी उससे सबसे ज्यादा झटका संघ को ही लगा । भले ही नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी संघ के ही नेता है, लेकिन अब वे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के धनी है । उनका लंबा सियासी करियर रहा है और उनकी नियुक्ति संघ परिवार के कारण  नहीं हुई बल्कि वे आम आम सहमति अध्यक्ष के पद पर पहुंचे हैं । यह संघ के फेस सेविंग का इकलौता विकल्प था जिसे उसने पूरी सादगी से अपनाया ।

लेकिन शीर्ष पर हुए इस बदलाव ने देश की भाजपाई सियासत के भविष्य को लेकर तमाम संकेत दिए हैं । इससे साफ़ हुआ कि भाजपा अब स्वयम भी अब एक भरा पूरा परिवार बना चुकी है । सारे निर्णयों पर अब पार्टी संघ के निर्णयों पर आँख बंद करके मुहर नहीं लगा सकती । यह कि पार्टी के वे नेता भी अब निर्णय के हकदार बन गए है जो संघ के नहीं है ,मसलन इसी मामले को ले लिया जाए । गडकरी के विरोध में आवाज उठाने वाले जेठमलानी परिवार और यशवंत सिन्हा तथा शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोग थे ,जिनका अतीत संघ से जुडा  नहीं है। 

इसीलिए इन सबके विरोध को कोई भी बड़ी गंभीरता से नहीं ले रहा था । स्वय गडकरी कल शाम तक पूरी तरह से आश्वस्त थे कि उनकी पुनर्नियुक्ति तय है लेकिन जिस तरह से पार्टी में पैठ कर रही लोकतान्त्रिक ताकतों की घड़ी की सुनियाँ घूमी ,संघ के सामने अवाक रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था । संघ ने इस मामले पर हटो -बचो की नीति अपनाई और आखिरकार राजनाथ के नाम पर सहमति जता दी। 

ऐसा करना उसकी मजबूरी भी हो सकती थी क्योंकि उसके अंतर्मन में यह भय होगा कि अगर उसकी और से किसी और का नाम दिया जिस पर कुछ लोग असहमत हुए तो विवाद बढेगा। राजनाथ एक ऐसा नाम था जिस पर पार्टी में कोई ज्यादा विरोध नहीं था । पार्टी के ज्यादातर शीर्ष नेता गडकरी की ताजपोशी रुकवाकर सिर्फ यह संकेत देना चाहते थे कि वे संघ के हर निर्णय को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है। इस मंशा के पीछे प्रधानमंत्री पद की दौड़ भी रही है। इससे यह भी संकेत दिया गया कि अगर देश में एनडीए की सरकार बनने की परिस्थितियां बनी तो भाजपा प्रधानमंत्री पद पर संघ के निर्णय को आँख बंद करके स्वीकार नहीं करेगी। 

राजनाथ सिंह के नाम पर सहमति  जताकर एक और सन्देश दिया गया है ,वह यह कि मोदी के लिए दिल्ली उतनी पास नहीं है जितनी मीडिया बताती रही है । गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी दिल्ली आकर प्रधानमंत्री पद की कुर्सी सँभालने को बहुत ब्याकुल है । उन्होंने हाल ही के विधासभा चुनावों में अपने को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी । यह तथ्य भी किसी से छुपा नहीं है कि दिल्ली के ज्यादातर भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के दाबेदार के रूप में नहीं देखना चाहते उन्होंने राजनाथ को आगे लाकर अपने काँटों की धार को और मजबूत कर दिया । राजनाथ सिंह को नरेन्द्र मोदी का कट्टर विरोधी माना जाता है । दोनों एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते । 

इस तरह मोदी विरोधियों द्वारा राजनाथ सिंह का समर्थन करके एक तीर से दो निशाने साध लिए । लेकिन आज का यह निर्णय भाजपा के लिए तात्कालिक रूप से भले ही समस्या निराकरण का सबब बन गया हो लेकिन असलियत यह है कि इसके जरिये दरारों पर सिर्फ काज ही चिपके है । अब प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का संघर्ष और तेज होगा । इस भीड़ में अब राजनाथ सिंह का नाम भी शामिल हो गया है । वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ,सुषमा स्वराज ,अरुण जेटली और नरेन्द्र मोदी तो पहले से ही इस कतार में शामिल है । इससे लगता है पिक्चर अभी बाकी है ।

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