सपनों के सौदागरों, किसान को बख्शो ! समाज टूट जायेगा

Thursday, June 8, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। मध्य प्रदेश ही नहीं महाराष्ट्र में भी किसान नाराज़ है। बहुत सपने दिखाए है राजनीति ने उसे, मध्यप्रदेश में खुद को कृषक पुत्र कहने वाले मुख्यमंत्री ने तो किसानों लिए स्वर्ग ही उतार दिया है कुछ भाषणों में, और अब प्रतिपक्ष किसान को हिंसा-राजनीति का औजार बना रही है। सरकार भले ही कुछ भी कहे। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इस मौसम में किसान खेत के स्थान पर सडक पर है। हाथ में हल की जगह हिंसा के औजार है। किसान कहीं दूध सड़कों पर बहा रहे हैं तो कहीं सब्जियां खुले में फेंक रहे हैं। दोनों राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं और इनके मुख्यमंत्रियों ने किसान आंदोलन से निपटने के लिए भी वही तरीका अपनाया है जो वे विपक्ष के खिलाफ सफलतापूर्वक आजमाते रहे हैं। यानी आक्रामक बयान जारी करना, प्रदर्शनकारियों को असामाजिक तत्व करार देना वगैरह।

और तो और मोदी सरकार ने अगले कुछ वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुनी करने का ब्लूप्रिंट तैयार करने की जिम्मेदारी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ही सौंप रखी है, जहाँ सबसे जायदा किसान आत्म हत्या करते है और आन्दोलन करने पर गोली चलती है। इन दोनों बीजेपी शासित राज्यों में किसानों की मांगें क्या हैं? सबसे बड़ी मांग यह कि वे उत्तर प्रदेश की तरह अपने यहां भी कर्जमाफी की घोषणा चाहते हैं। 

देश का बैंकिंग सेक्टर फिलहाल लाखों करोड़ रुपये के डूबे कर्ज के चलते अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। यूपी का कर्जमाफी फार्मूला देश भर में अपनाने का अर्थ होगा बैंकों को तीन-चार लाख करोड़ रुपये की चपत और वित्तमंत्री अरुण जेटली पहले ही कह चुके हैं कि केंद्र सरकार अपनी तरफ से किसी का एक पैसा भी कर्ज नहीं माफ करने वाली, राज्य सरकारें अपने संसाधनों से इस दिशा में जो कर सकती हैं, वह करें।

इन प्रदेशों की ही नहीं सारे देश के किसानों की मुख्य समस्या बैंकों से लिया गया कर्ज नहीं, कुछ और है। 2014 और 2015 में वे अपनी फसलों पर सूखे की मार झेल चुके हैं। 2016 में मॉनसून ठीक रहा तो खरीफ की फसल आते ही नोटबंदी लागू हो गई। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में नियमित वृद्धि का जो तरीका यूपीए ने अपना रखा था, एनडीए सरकार ने उससे हाथ खींच रखे हैं। यह काम सिर्फ दलहनों के लिए किया गया, लेकिन महाराष्ट्र के किसानों को अपनी उपजाई अरहर 5050 रुपये प्रति क्विंटल के घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना में मात्र 4000 रुपये या इससे भी कम दाम पर बेचनी पड़ी। कारण? जो सरकारी या सहकारी संस्थाएं उनसे समर्थन पर अरहर खरीद सकती थीं, उनके पास खरीदारी के लिए नकदी ही नहीं थी।

सत्तापक्ष को किसानों के साथ विपक्ष जैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए। किसान न तो राजनीति करना जानते हैं, न ही ट्रेड यूनियनों की तरह सौदेबाजी का तजुर्बा उनके पास है। ऐसे में किसान आंदोलनों के अंधी हिंसा में फंसने का खतरा बहुत ज्यादा है। कहने की जरूरत नहीं कि क्रोध और हताशा में अगर उन्होंने खेती से अपना ध्यान हटा लिया तो कुछ महीने बाद इससे सबसे ज्यादा परेशानी शहरी मध्यवर्ग को ही होने वाली है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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