समाज को बाँटने वाली राजनीति बंद हो - क्लिक करें | No 1 Hindi News Portal of Central India (Madhya Pradesh) | हिन्दी समाचार

समाज को बाँटने वाली राजनीति बंद हो

Sunday, October 16, 2016

;
राकेश दुबे@प्रतिदिन। अरविन्द केजरीवाल गुजरात के बाद महाराष्ट्र जायेंगे ने इन राज्यों में उन समुदायों को हवा दे रहे है, जो आरक्षण मांग रहे हैं। आरक्षण को लेकर आंदोलनरत मराठों की यह मांग ठीक उसी प्रकार की है जैसी हरियाणा के जाटों और गुजरात के पाटीदार पटेलों ने की थी। पटेलों और जाटों के जैसे ही मराठा भी मूलत: एक कृषक जाति है, पर आज के वर्तमान नव-उदारवादी दौर में खेती-किसानी पर छाए आर्थिक संकट ने मराठा जाति को अपने भविष्य के प्रति आशंकित कर दिया है। ऐसा नहीं है कि संपूर्ण मराठा कौम इस संकट से जूझ रही हो। मराठा जाति चुनावी राजनीति में सदा से केंद्रीय भूमिका में रही है। 

राज्य के राजनीतिक अर्थशास्त्र में यह जाति नियंत्रणकारी स्थिति में रहती आई है। मगर वर्तमान नवउदारवादी दौर में कुछ मुट्ठी भर मराठा परिवारों ने तमाम संसाधनों और अवसरों को हथिया लिया है। मंत्रालयों, सहकारी समितियों और बैंकों से लेकर सहकारी गन्ना मिलों और निजी क्षेत्र के उद्यमों तक इस समुदाय के एक अभिजात तबके ने अपना वर्चस्व बनाया हुआ है। बहुसंख्यक मराठा कौम आज शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसरों से स्वयं को वंचित महसूस कर रही है। अकाल, भुखमरी और बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं और बाजार में उत्पादन लागत भी न मिल पाने जैसी व्यवस्थागत खमियों से जूझता एक मराठा किसान आज खेती-किसानी से मुक्ति पाना चाहता है, पर कोई वैकल्पिक रोजगार उसके पास नहीं है। इस प्रकार एक आम मराठा का हक मारने वाले लोग उसी के समाज के उच्च अभिजात तबके से आते हैं। पर शीर्ष मराठा नेतृत्व ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए परदे के पीछे से वह हर संभव कोशिश की है, जिससे मराठा जाति के अंदर का असंतोष और आक्रोश समस्या के वाजिब कारणों की ओर न होकर अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों को प्राप्त आरक्षण विषयक विशेष सुविधाओं की दिशा में मोड़ा जा सके।

मराठा समुदाय के जातिवादी पूर्वाग्रहों को भी उनके असंतोष के शमन के लिए उभारा जा रहा है। निकट अतीत में भी भूस्वामी पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक दल तमिलनाडु आदि में अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को कमजोर करने या हटाए जाने की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन करते आए हैं। इसके विपरीत मराठा जाति के बड़े भूस्वामी अपना आर्थिक-सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखने के लिए अपने मार्ग में बाधक बनने वले दलित-आदिवासी संरक्षक अत्याचार निवारण अधिनियम की कानूनी अड़चन को ही जड़ से उखाड़ देना चाहते हैं। इसलिए अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग राग अलाप कर वे इसे खारिज कराना चाहते हैं। कांग्रेस पार्टी और शिवसेना और अरविन्द केजरीवाल  जैसे  मराठा अस्मिता को भुनाने वाले राजनीतिक दल पूंजीवादी आर्थिक नीतियों से उपजे असंतोष को उभार करके उसे दलित-विरोधी बना डालने की कुचेष्टा कर रहे हैं। इनके प्रयास कारगर हुए तो पुरे देश का समाज बंट जायेगा।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
पूर्व में प्रकाशित लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए
आप हमें ट्विटर और फ़ेसबुक पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।
;

No comments:

Popular News This Week