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भारत में मानसिक रोगियों की संख्या 17 करोड़

Thursday, October 13, 2016

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नई दिल्ली। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहांस) के रिसर्च स्टडी में पाया गया है कि भारत में मानसिक रोग भयावह स्थिति में पहुंच गया है। रिसर्च के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल आबादी के 13.7 प्रतिशत यानि लगभग 17 करोड़ लोग कई प्रकार के मानसिक रोग के शिकार हैं। 13 करोड़ लोगों को तुरंत इलाज की जरूरत है। 

भारत में मानसिक रोगियों की समस्या पर स्टडी के लिए भारत सरकार ने 2014 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज को कहा था। इस स्टडी का उद्देश्य यह पता लगाना था कि देश में मानसिक रोगियों की स्थिति क्या है? 1980 में भारत में नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम भारत में मानसिक रोगियों को लेकर पहला मेंटल हेल्थ प्रोग्राम 1980 में शुरू किया गया। उस समय देश में मनोरोगियों की समस्या के बारे में ठीक से पता नहीं लगाया जा सका। लगभग एक दशक पहले भारत में मनोरोगियों के बारे में जानने के लिए एक सर्वे किया गया था लेकिन इसमें भी कई खामियां पाई गईं। इस रिपोर्ट में यह कहा गया था कि रिसर्च विधियों की सीमाओं की वजह से देश और राज्य में मनोरोगियों की संख्या का ठीक-ठीक आंकलन करना संभव नहीं है। 

निमहांस के अध्ययन में क्या-क्या निकला? 
2014 में निमहांस ने देश में मनोरोगियों की संख्या पता लगाने का जिम्मा लिया। देश के 12 राज्यों से लगभग 35 हजार लोगों का सैंपल इकट्ठा किया गया। कर्नाटक के कोलार इलाके में मनोरोग के सभी पक्षों जैसे डिसॉर्डर, तंबाकू संबंधित डिसॉर्डर, गंभीर मनोरोगों, अवसाद, एंजायटी, फोबिया आदि पर पायलट स्टडी की गई। 

शहरी इलाकों में ज्यादा मानसिक रोगी 
निमहांस के अध्ययन में पाया गया है कि शहरी इलाकों में मानिसक रोग से ग्रस्त लोगों की संख्या ज्यादा है। शहरों में कई लोग सिजोफ्रेनिया, मूड डिसॉर्डर्स, न्यूरोटिक और तनाव से जुड़े डिसॉर्ड्स के शिकार हैं। रिसर्चर्स का मानना है कि भागदौड़ वाली जीवनशैली, तनाव, भावनात्मक समस्याओं, सपोर्ट सिस्टम की कमी और आर्थिक चुनौतियों की वजह से मानसिक रोगियों के मामले में शहरों का बुरा हाल है। 

रोग बहुत ज्यादा, उपचार बहुत कम 
देश के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि जहां चार में से तीन लोग किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त मिले हैं वहीं उनके उपचार की व्यवस्था काफी दयनीय हालत में है। मिर्गी को छोड़कर बाकी सभी मानिसक रोगों के इलाज की हालत देश में खराब है। देश में मानसिक रोग के खिलाफ नकारात्मक माहौल की वजह से 80 प्रतिशत लोगों का सही समय पर इलाज नहीं हो पाता। 

क्या है इस भयावह स्थिति की वजह? 
रिसर्चर्स का कहना है 1980 में शुरू हुए नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम को ठीक से देश में लागू नहीं किया गया, इसी वजह से आज मानिसक रोग इस खौफनाक स्थिति तक पहुंच गया है। देश के हेल्थ एजेंडे में मानसिक रोग को काफी कम महत्व मिला हुआ है। 

मेंटल हेल्थ पर नेशनल कमीशन की जरूरत 
रिसर्चर्स का कहना है कि देश में मानिसक रोग विशेषज्ञों का अभाव है, साथ ही इसके लिए ज्यादा संस्थान भी नहीं हैं। मानसिक रोग की दवाओं की सप्लाई भी कम है। इस समस्या से लड़ने के लिए सरकार को और धन मुहैया कराने की जरूरत है। स्टडी में कहा गया है कि मेंटल हेल्थ पर एक नेशनल कमीशन का गठन सरकार को करना चाहिए। इसमें मनोरोग विशेषज्ञ, समाज विज्ञानियों और जजों समेत अन्य विशेषज्ञों को शामिल करना चाहिए। देश में मानसिक रोगों पर नीतियों की मॉनिटरिंग, रिव्यू और सपोर्ट देने का काम इस कमीशन को सौंप देना चाहिए।
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