पुरस्कार की लालसा ने कुछ साहित्यकारों को इतना लचीला बना दिया है कि वे आत्मसम्मान की पुड़िया बनाकर पिछली जेब में रखने लगे हैं। जहाँ पुरस्कार मिलने की संभावना दिखती है, वह उसी ओर देखते रहते हैं जब तक कि उसका जुगाड़ न हो जाये। इसके लिए वह पहले गर्दन झुकाते थे अब समय बदलने से कमर झुकाते हैं। गर्दन अपने आप नब्बे डिग्री झुक जाती है ताकि ठीक से देख सकें कि सामने वाले की चरण पादुकायें प्रभु श्री राम जैसी हैं या नहीं, और क्या उनसे आगे राजकाज चल सकता है? भावना दिल में यही है- राम काज कीजे बिना मोहि कहां वि़श्राम? धार्मिक आधार पर आपको कोई आपत्ति हो तो मैं लिख देता हूं-पुरस्कार लीजे बिना मोहि कहां विश्राम?
ऐसी विभूतियां कार्यक्रम संयोजक का चेहरा देखते ही खिल उठती हैं। उनके चेहरे की अपूर्व शांति और आनंद को गौर से देखने पर लगता है जैसे उन्हें बरसों से बिछड़ा हुआ अपना आध्यात्मिक गुरु मिल गया है। कुछ प्रतिभाएँ तो इतनी बहुमुखी होती हैं कि आयोजक को देखते ही उसके गले में झूल जाती हैं। कई बार लगता है ये दोनों गिर न पड़ें। इन्हें देखकर कहना ही पड़ता है कि पहले राजनेता साहित्यकारों का अनुसरण करते थे आजकल साहित्यकार राजनेताओं का कर रहे हैं। किसे अपनी पुस्तक भेंट करनी है किसे नहीं, किस मंच पर किसकी प्रशंसा करनी है और किसकी नहीं ,समूह में किस आलोचक की निंदा करनी है और किसकी अगले पुरस्कार मिलने तक टालनी है ये इसका बड़ी बारीकी से ध्यान रखते हैं। यारी दोस्ती भी इसी हिसाब से रखते हैं ,ये अलग से बताने की बात नहीं है।पर कहते यही मिलेंगे-हानि लाभ जीवन मरण लस अपजस विधि हाथ।तब इन पर बलिहारी होने का मन करता है किन्तु मैं ऐसे अनेक अवसरों पर चाहते हुए भी मन मसोस कर रह जाता हूं कि कोई मुझे इनके खेमे का न समझ ले।
सभी वरिष्ठ साहित्यकार जो नामी गिरामी हैं, पुरस्कार समितियों में हैं या जिनका इन मामलों में गहरा दखल है ,वही इनका साहित्यिक संरक्षक- साहित्यिक अभिभावक होता है जिसकी सार्वजनिक घोषणा ये समयोचित गोष्ठियों व सेमीनारों में करते रहते हैं। इनके पांव पड़कर आशीर्वाद लेने में भी कोताही नहीं करते। क्योंकि पुरस्कार सदा विचारधारा से बड़ा होता हैं।यद्यपि कुछ मूर्ख इस सत्य को नहीं समझते।ऐसे दुर्जनों की ओर पल भर भी देखना ये सज्जन पसंद नहीं करते। कोई कुछ भी कहे, पुरस्कार का विरोध करना आसान है,किन्तु पुरस्कार की लालसा छोड़ना कठिन। क्योंकि पुरस्कार केवल सम्मान-पत्र ही नहीं ,परिचय में लगने वाला तमगा, मीडिया पर चमकने वाला पदक और सोशल मीडिया पर फहरने वाली कीर्ति पताका भी है। साहित्य से जुड़े लोग भी कम जानते हैं कि सम्मान रचना का मूल्यांकन नहीं संबंधों का प्रतिफल है। अब तो सर्वकालिक महान साहित्यकारों की शकल देखकर ही समझ में आ जाता है कि इनमें पुरस्कार प्राप्त करने की अद्भुत क्षमता है। फलतः भविष्य में इन्हें हिंदी साहित्य के अप्रतिम हस्ताक्षर, युगद्रष्टा, चिंतक और संवेदना के शिखर पुरुष कहा जाये तो आश्चर्य की कोई बात नहीं।
शायद उपन्यास कहानी कविता गीत गजल दोहा चौपाई की तरह साहित्य में चाटुकारिता भी एक विधा बन गई है।लोग इसमें भी मेहनत कर पारंगत हो रहे हैं। विद्वानों ने कहा भी है।करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। आने वाले समय में संभवतः साहित्यिक संस्थायें इस विधा के लिए भी पुरस्कारों की घोषणा करने लगें। जैसे मोक्ष पाने की लालसा रखने वाले सन्यासी अपने हाथों अपना पिंडदान करते हैं उसी तर्ज पर साहित्यिक बंधु बांधव भी पुरस्कार की लालसा में अपने हाथों अपने सम्मान का अंतिम संस्कार करने लगे हैं। डर है कि आने वाले समय में साहित्यकारों के अध्ययन कक्ष में किताबों की जगह केवल सम्मान प़त्र के ढेर न मिलने लगंे।
डॉ.महेन्द्र अग्रवाल
स. नई ग़ज़ल सदर बाजार शिवपुरी म.प्र. 473551
मो.9425766485
ई-मेल mkagrwal@yahoo.com

