जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे जनहित में वापस नहीं होंगे, हाई कोर्ट चेक करेगा

Updesh Awasthee
भोपाल, 6 नवंबर 2026:
हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश में एक स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई चल रही है। इसमें हाई कोर्ट द्वारा स्पष्ट किया गया है कि, जनप्रतिनिधियों (सांसद एवं विधायक इत्यादि) के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे, पहले की तरह जनहित में वापस नहीं होंगे। सभी मामले परीक्षण के लिए हाईकोर्ट में आएंगे। 

अर्जी पर मनमर्जी अब नहीं चलेगी

6 नवंबर 2026 को सामने आई न्यायिक व्याख्या के अनुसार, अब राज्य सरकार की सिफारिश पर किसी भी मौजूदा या पूर्व जनप्रतिनिधि के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को वापस लेने का अंतिम निर्णय संबंधित हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में होगा। राज्य की विशेष एमपी-एमएलए अदालतें अब सीधे तौर पर ऐसे मामलों में अभियोजन वापस लेने की अर्जी पर अपनी मर्जी से फैसला नहीं सुना सकेंगी। इस स्पष्ट व्यवस्था के बाद कार्यपालिका की उस पुरानी परिपाटी पर कड़ा अंकुश लग गया है, जिसमें सत्ता परिवर्तन होते ही राजनीतिक रसूख के बल पर दर्जनों गंभीर और सामान्य मुकदमों को जनहित या राजनीतिक द्वेष का नाम देकर आनन-फानन में वापस ले लिया जाता था। 

अब तक कई मामलों में यह देखा जाता था कि सरकार बदलने के बाद लोक अभियोजक यानी सरकारी वकील के माध्यम से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अदालत में आवेदन लगाया जाता था और विशेष अदालतें स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर केस वापसी की मंजूरी दे देती थीं। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के पहले के दिशा-निर्देशों को रेखांकित करते हुए साफ कर दिया है कि जब तक उच्च न्यायालय की विशेष पीठ इस पर अपनी मुहर नहीं लगाती, तब तक कोई भी विशेष अदालत जनप्रतिनिधियों पर चल रहे मुकदमों की फाइल बंद नहीं कर सकती। 

सुप्रीम कोर्ट का लैंडमार्क जजमेंट: अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ

यह पूरा घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट के उस लैंडमार्क जजमेंट की निरंतरता में है, जो वर्ष 2021 में अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ के चर्चित मामले में जारी किया गया था। देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया था कि देश भर में सांसदों और विधायकों के खिलाफ दर्ज किसी भी आपराधिक मामले को संबंधित राज्य के हाई कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना वापस नहीं लिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने पाया था कि विभिन्न राज्यों में सत्ताधारी दल अपने नेताओं पर लगे संगीन आरोपों जैसे दंगा भड़काना, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, आचार संहिता का उल्लंघन और भ्रष्टाचार के मामलों को एक कलम से खत्म कर रहे थे।

मध्य प्रदेश में स्पेशल कोर्ट केवल मामले को फारवर्ड करेगी

मध्य प्रदेश में इस व्यवस्था को लेकर जो भ्रम की स्थिति बनी हुई थी, उसे अब पूरी तरह से दूर कर दिया गया है। शासन की ओर से सुप्रीम कोर्ट के दिसंबर 2025 के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए बताया गया कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों में अभियोजन वापसी के आवेदनों की जांच और उन पर अनुमति देने का अधिकार हाई कोर्ट के पास है।

हाई कोर्ट की ओर से मध्य प्रदेश की विशेष अदालतों को यह साफ हिदायत दी गई है कि वे किसी भी सूरत में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी न करें। यदि अभियोजन पक्ष मुकदमा वापस लेने का आवेदन प्रस्तुत करता है, तो विशेष अदालत का दायित्व केवल उस अर्जी को दर्ज कर रिकॉर्ड तैयार करना और मामले को विधिवत समीक्षा के लिए हाई कोर्ट की सक्षम पीठ के पास अग्रेषित करना है। जब तक हाई कोर्ट से स्पष्ट अनापत्ति या मंजूरी प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक विशेष अदालत केस बंद करने का कोई आदेश पारित नहीं करेगी। 

लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की यह स्पष्ट व्यवस्था देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक ठोस कदम है। जब कानून बनाने वालों को भी उसी अदालत और उसी प्रक्रिया से गुजरना होगा जिससे एक आम नागरिक गुजरता है, तभी न्याय व्यवस्था की गरिमा अक्षुण्ण रह सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार की ओर से लंबित पड़े ऐसे सभी मामलों की फाइलें किस तत्परता से हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की जाती हैं और उन पर न्यायपालिका का क्या अंतिम निर्णय आता है।

मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को निर्धारित की है।

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!