RSSMP में बड़ा बदलाव: 3 प्रांत खत्म, अब 7 नए संभाग संभालेंगे कमान

Updesh Awasthee
इंदौर, 8 नवंबर 2026:
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने मध्य प्रदेश में अपने सांगठनिक ढांचे में बड़ा युगांतरकारी पुनर्गठन किया है। दशकों पुरानी त्रि-प्रांतीय व्यवस्था को समाप्त करते हुए संघ ने पूरे राज्य को एक एकीकृत प्रशासनिक राज्य इकाई के रूप में ढालने और कार्यप्रणाली को अधिक विकेंद्रीकृत करने के लिए सात संभागों में पुनर्गठित करने की रूपरेखा तैयार की है। अब तक राज्य का कार्यक्षेत्र मध्य भारत, महाकौशल और मालवा नामक तीन प्रांतों में विभाजित था, जिन्हें आगामी मार्च से औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया जाएगा। इस नई व्यवस्था के तहत भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, इंदौर, जबलपुर, रीवा और सागर के रूप में सात स्वतंत्र प्रशासनिक संभाग बनाए गए हैं। यह सांगठनिक बदलाव संघ के शताब्दी वर्ष के संकल्पों और मंडल स्तर तक शाखा विस्तार की महत्वाकांक्षी योजना का हिस्सा है।

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक में आधिकारिक घोषणा होगी

7 नवंबर 2026 तक प्राप्त सांगठनिक जानकारी के अनुसार, आगामी मार्च में आयोजित होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक में इस निर्णय पर औपचारिक मुहर लगेगी। इसके तुरंत बाद नई व्यवस्था पूरे राज्य में लागू हो जाएगी। संघ की आंतरिक कार्यपद्धति में किसी बड़े राज्य के ढांचे को पूरी तरह बदलने का यह कदम स्वयंसेवकों के दैनिक कामकाज के साथ-साथ राज्य के सामाजिक और वैचारिक परिदृश्य पर भी असर डालेगा। संघ नेतृत्व का मानना है कि विगत दशकों में मध्य प्रदेश की आबादी, भौगोलिक विस्तार और शाखाओं की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी हुई है, जिसके चलते पुरानी व्यवस्था में दूरदराज के अंचलों तक सीधा संवाद और त्वरित निर्णय लेना कठिन हो रहा था।

दशकों पुरानी त्रि-प्रांतीय व्यवस्था का इतिहास और समाप्ति का कारण

मध्य प्रदेश में संघ का सांगठनिक इतिहास बताता है कि आजादी के बाद से ही राज्य को उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं के आधार पर तीन प्रांतों में बांटा गया था। मध्य भारत प्रांत का केंद्र भोपाल और ग्वालियर था, मालवा प्रांत का केंद्र इंदौर और उज्जैन था, जबकि महाकौशल प्रांत का केंद्र जबलपुर और रीवा था। प्रत्येक प्रांत का अपना स्वतंत्र नेतृत्व होता था, जिसमें प्रांत संघचालक, प्रांत कार्यवाह और प्रांत प्रचारक प्रमुख थे। 

वर्तमान में मध्य प्रदेश में 55 जिले हैं और हजारों दैनिक शाखाएं संचालित हो रही हैं। पुरानी व्यवस्था में एक-एक प्रांत के तहत 15 से 20 जिले आते थे। विशाल क्षेत्र होने के कारण प्रांतीय पदाधिकारियों को नियमित प्रवास करने और दूरदराज की तहसीलों तक पहुंचने में लंबा समय लगता था। इसके अलावा राज्य स्तर पर किसी साझा अभियान के दौरान तीनों प्रांतों के बीच समन्वय में कई बार दोहराव और समय की बर्बादी होती थी। इसी प्रशासनिक दूरी को पाटने के लिए संघ ने पूरे ढांचे को नए सिरे से संगठित किया है।

सात नए संभाग: विकेंद्रीकरण और सूक्ष्म प्रबंधन

इस नए ढांचे का मुख्य आधार विकेंद्रीकरण और सूक्ष्म प्रबंधन (माइक्रो-मैनेजमेंट) है। संघ ने पूरे राज्य को एक इकाई मानते हुए उसके तहत सात संभाग गठित किए हैं। यह संभाग राज्य के प्रमुख सांस्कृतिक और भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनका आकार संतुलित रखा गया है ताकि पदाधिकारी हर जिले तक आसानी से पहुंच सकें।

संभागों का नया स्वरूप इस प्रकार निर्धारित किया गया है:

भोपाल संभाग: भोपाल, सीहोर, रायसेन, राजगढ़ और विदिशा जिले। यह प्रशासनिक समन्वय का केंद्र होगा।
ग्वालियर संभाग: ग्वालियर, भिंड, मुरैना, श्योपुर, दतिया, शिवपुरी और गुना जिले इस संभाग में शामिल हैं।
इंदौर संभाग: इंदौर, धार, खरगोन, बड़वानी, खंडवा और बुरहानपुर जिले, जो औद्योगिक और जनजातीय केंद्र हैं।
उज्जैन संभाग: उज्जैन, देवास, शाजापुर, आगर मालवा, रतलाम, मंदसौर और नीमच जिले इसमें शामिल किए गए हैं।
जबलपुर संभाग: जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, मंडला और डिंडोरी जिले।
रीवा संभाग: रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, मऊगंज और मैहर जिले इस संभाग का हिस्सा होंगे।
सागर संभाग: सागर, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना और निवाड़ी जिले बुंदेलखंड अंचल के रूप में संचालित होंगे।

नई सांगठनिक संरचना: राज्य प्रचारक और प्रदेश कार्यसमिति

अब तक मध्य प्रदेश में कोई एकल प्रदेश प्रचारक या राज्य कार्यसमिति नहीं थी। तीनों प्रांत स्वतंत्र रूप से काम करते थे और उनके प्रांत प्रचारक सीधे राष्ट्रीय बैठकों में रिपोर्ट करते थे। नई व्यवस्था में पूरे मध्य प्रदेश के लिए एक 'राज्य प्रचारक' (प्रदेश प्रचारक) और 'प्रदेश कार्यसमिति' का गठन किया जाएगा।

यह प्रदेश कार्यसमिति पूरे राज्य की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई होगी। इसके नीचे सातों संभागों में संभागीय इकाइयां होंगी, जहां संभाग प्रचारक और संभाग कार्यवाह जिम्मेदारी संभालेंगे। इससे राज्य स्तर पर आपदा राहत, सामाजिक कार्यों और संवाद के लिए एक ही आधिकारिक मंच रहेगा, वहीं संभागीय अधिकारियों पर कार्यभार कम होने से वे हर ग्राम पंचायत तक शाखाओं को मजबूत करने में समय दे सकेंगे।

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