भोपाल, 11 अक्टूबर 2026: मध्य प्रदेश में 20 साल पहले 2006 से शुरू हुए व्यापम घोटाले के कुछ मामलों पर CBI ने भले ही पर्दा डाल दिया हो लेकिन कई मामलों का खुलासा आज भी हो रहा है। लेटेस्ट मामले में एक व्यक्ति को सॉल्वर बिठाकर मेडिकल सीट नहीं दिलवाई, MBBS में एडमिशन दिलवाकर बिना पढ़ाई के पास नहीं करवाया बल्कि MBBS में बिना एडमिशन लिए, बिना 5 साल बिताए, न केवल डायरेक्ट डिग्री दे दी गई बल्कि सरकारी नौकरी लगवाई और फिर परमानेंट करवरकर प्रमोशन भी दिलवाया। व्यापम घोटाले की दहशत देखिए, जब तक व्यवस्था नहीं बदल गई तब तक लोग शिकायत भी नहीं कर पाए। आपको याद होगा हाल ही में इंदौर में व्यापम घोटाला वाले 51 शिक्षकों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं।
फर्जी डिग्री पर असली सरकारी नौकरी का खेल
स्वास्थ्य विभाग के सीएमएचओ शत्रुघन दाहिया से मिली जानकारी अनुसार, वर्ष 2009 में सुनील सिंह को बालाघाट में संविदा डॉक्टर के रूप में भर्ती किया गया था। इसके बाद 2012 में सुनील सिंह को नियमित कर दिया गया और 2020 में इनको प्रभारी BMO बना दिया गया। इसके बाद क्लास-वन में प्रमोशन कर दिया और 2023 से लगातार उपस्वास्थ्य केन्द्र बिरसा में बीएमओ पदस्थ रहे। उन्होंने अपनी डिग्री रीवा के अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय से प्राप्त होने का दावा किया था। स्वास्थ्य विभाग की जांच में फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद आरोपी डॉक्टर के खिलाफ बिरसा थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है।
व्यापम घोटाले में लोग ऐसे भी डॉक्टर बने थे
व्यापम घोटाले के बारे में लोगों को केवल इतना पता है कि, प्रवेश परीक्षा में परीक्षार्थी के स्थान पर किसी दूसरे सॉल्वर को बिठाकर पेपर दिया गया। जिसके कारण परीक्षार्थी पास हो गया और अयोग्य होने के बाद भी उसको MBBS की सीट मिल गई लेकिन व्यापम घोटाला केवल इतना नहीं था। जिन लोगों ने ज्यादा पैसा दिया उनको MBBS डिग्री प्राप्त करने के लिए ना तो एडमिशन लेना पड़ा और ना ही हॉस्टल में रहकर पढ़ने का अभिनय करना पड़ा। उनको डायरेक्ट डिग्री मिल गई। सिर्फ डिग्री नहीं हुई बल्कि सुनील सिंह की तरह पहले संविदा डॉक्टर बनाया गया। डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन नहीं होने दिया गया। फिर परमानेंट किया गया और फिर प्रमोशन देकर ए-क्लास ऑफिसर भी बनाया गया।
10 साल तक मामले का खुलासा क्यों नहीं हुआ
ऐसा नहीं है कि लोगों को पता नहीं था, लेकिन लोगों को यह भी पता था कि व्यापम घोटाले में ठोस सबूत के साथ शिकायत करने वाले और गवाही देने वालों की एक्सीडेंट में मौत हो जाती है। इसलिए कभी किसी ने कुछ नहीं कहा। 2026 में जब सरकार ने बालाघाट को नक्सली मुक्त करवाने के लिए अभियान शुरू किया और पहली बार सरकारी एजेंसियां ईमानदारी से काम करती हुई दिखाई दी तब मामले को एक बार फिर सरकार के सामने लाया गया। इस बात की संभावना है कि इससे पहले भी सुनील सिंह की शिकायत की गई हुई परंतु कोई नहीं जानता कि सुनील सिंह से संबंधित शिकायत रिकॉर्ड में है या नहीं।
व्यापम घोटाले के मास्टरमाइंड पर भरोसा देखिए
जून 2026 में जब सुनील सिंह की शिकायत को जांच के योग्य पाया गया तो उनको BMO के पद से हटा दिया गया। सुनील सिंह को समझ में आ गया था कि उनका खेल खत्म हो गया है। विभागीय जांच के दौरान सुनील सिंह को कई बार अपना पक्ष रखने के लिए भोपाल बुलाया गया लेकिन सुनील सिंह उपस्थित नहीं हुए, लेकिन नौकरी छोड़कर फरार भी नहीं हुए। शायद उनको व्यापम घोटाला के मास्टरमाइंड पर भरोसा था, अथवा मास्टरमाइंड ने विश्वास दिलाया था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। इसलिए वह बिरसा के दमोह में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे।
जुलाई 2026 में जब उनको पता चल गया कि कुछ नहीं हो सकता है, डॉक्टर मोहन यादव की सरकार, व्यापम घोटाला वाले लोगों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही है तो फिर एक महीने की मेडिकल लीव लेकर किसी अज्ञात स्थान पर जाकर छुप गए हैं।
इन्वेस्टिगेशन में यह भी पता चला है कि, बालाघाट वाले सुनील सिंह को प्रमोशन देने के लिए, देवास में पदस्थ असली डॉक्टर सुनील सिंह के डाक्यूमेंट्स का उपयोग किया गया था। फर्जी डॉक्टर के दस्तावेजों में गृह जिला कहीं मुरैना, कहीं रीवा तो कहीं बालाघाट दर्ज था। इसके अलावा फर्जी डॉक्टर सुनील सिंह पास परमानेंट रजिस्ट्रेशन का कोई रिकॉर्ड नहीं था, सिर्फ प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन के कागज जमा थे।
राज्य स्तरीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर बिरसा पुलिस ने आरोपी फर्जी डॉ. सुनील सिंह के खिलाफ बीएनएस की धारा 318(4), 340(2) और 336(3) के तहत केस दर्ज कर लिया है। पुलिस, सुनील सिंह के संभावित ठिकानों पर उनकी तलाश कर रही है परंतु सुनील सिंह जुलाई से ही अंडरग्राउंड है। पता नहीं भारत में भी है या नहीं।

