एक कचोरी दो समोसा: यह कह देना कितना आसां पर क्या अंतिम सत्य यही है?

Updesh Awasthee
एक कचोरी दो समोसा
इन मर्दों का क्या भरोसा 
यह कह देना कितना आसां
पर क्या अंतिम सत्य यही है?
तेरी आज़ादी में मेरा,
क्या कोई स्थान नहीं है? 

माता सीता की खातिर जब,
सागर पर सेतु बांधा। 
नल मर्द था, नील मर्द था,
हर वानर के हृदय दर्द था। 
सोम मर्द था, राम मर्द था,
राधा का घनश्याम मर्द था।
जिसने तुझको सती से रोका, 
वह भी राजा राम मर्द था। 

मुग़ल से तेरी ढाल बने,
जो लड़े समर, वो मर्द ही थे।
संविधान में हक़ दिलवाने, 
वाले रहबर मर्द ही थे। 

तू माँ है, तू बहन है मेरी,
तू ही धड़कन, रंग तू ही है।
तू ही मेरी नन्ही खुशियां,
जीवन का आनंद तू ही है। 

तेरे बिन निष्प्राण खड़ा मैं,
सूखा हुआ पहाड़ी सा हूँ,
दोनों से सृष्टि बनती है,
यही सत्य है, यही सत्य है। 

एक कचोरी दो समोसा
इन मर्दों का क्या भरोसा 
यह कह देना कितना आसां
पर क्या अंतिम सत्य यही है? 
✒कमलांश 
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