27% ओबीसी आरक्षण के लिए राहुल गांधी की चिट्ठी और चिट्ठी का जवाब पढ़िए

Updesh Awasthee
भोपाल समाचार, 23 सितंबर 2026:
कांग्रेस के पीएम कैंडिडेट राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को 27% ओबीसी आरक्षण के लिए चिट्ठी लिखी है। यहां हम आपको राहुल गांधी की चिट्ठी, चिट्ठी में पूछा गया सवाल और सवाल का जवाब, एक साथ प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि आप मामले को ठीक प्रकार से समझ सकें और किसी निष्कर्ष तक पहुंच पाएं:- 

मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के लिए राहुल गांधी की चिट्ठी

डॉ मोहन यादव मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश; माननीय मुख्यमंत्री, इंदौर में छात्रों की गूंज कार्यक्रम के दौरान मध्यप्रदेश के अनेक छात्रों ने शिक्षा, रोजगार और अपने भविष्य से जुड़े कई गंभीर मुद्दे उठाए। इनमें OBC आरक्षण के तहत रुकी नियुक्तियों का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया।

उन्होंने बताया कि लंबे समय से रुकी हुई नियुक्तियों के कारण वे लगातार अपने भविष्य की लेकर अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। इन युवाओं ने परीक्षा पास कर सारी प्रक्रिया पूरी कर ली है, फिर भी 87:13 व्यवस्था के तहत OBC आरक्षण से जुड़े 13% पदों को होल्ड पर रखा गया है और इन पदों पर चयनित अभ्यर्थी 2022 से आज तक नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।

सभी दलों ने सर्वसम्मति से 27% OBC आरक्षण को समर्थन दिया था। फिर भी इस मुद्दे का समाधान अब तक नहीं हुआ है। इसी देरी के कारण अभ्यर्थी आरक्षण के क्रियान्वयन और अपनी नियुक्ति की मांग को लेकर बार-बार सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।

आपसे अनुरोध है कि छात्रों के प्रतिनिधियों से मिलकर उनकी बात सुनें और जल्द से जल्द इस मुद्दे का समाधान करें। इस देरी के कारण अभ्यर्थी पहले ही अपना बहुत कीमती वक्त गंवा चुके है। अब बिना किसी देरी के 27% OBC आरक्षण लागू कर 13% होल्ड पदों के सभी चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दिए जाएं। 

चिट्ठी में राहुल गांधी का सवाल 
सभी दलों ने सर्वसम्मति से 27% OBC आरक्षण को समर्थन दिया था। फिर भी इस मुद्दे का समाधान अब तक क्यों नहीं हुआ है। 

अब जानिए की कृपा कहां रुकी हुई है

मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण का विवाद 2019 से चल रहा है और अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। मुख्य समस्या यह है कि ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने पर राज्य का कुल आरक्षण 50% की संवैधानिक सीमा से काफी ऊपर चला जाता है। 2019 में कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया। इससे SC+ST+OBC = 63% हो जाता है और EWS जोड़ने पर कुल आरक्षण 73% तक पहुंच जाता है। यही मुख्य कानूनी अड़चन है।

जिसकी जितनी आबादी है उसको उतना आरक्षण नहीं दे सकते

सबसे बड़ा आधार इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) का फैसला है। नौ जजों की बेंच ने कहा था कि आरक्षण सामान्यतः 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए, सिवाय “असाधारण परिस्थितियों” के। 2021 में मराठा आरक्षण मामले (जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल) में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से 50% सीमा दोहराई और महाराष्ट्र के 16% मराठा आरक्षण को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि: मात्र आबादी ज्यादा होना काफी नहीं है। सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन और सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का ठोस, समकालीन डेटा चाहिए। “असाधारण परिस्थिति” साबित करनी पड़ती है।

गलती किससे और कहां हुई?

संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत राज्य सरकार (कैबिनेट, जिसका नेतृत्व मुख्यमंत्री करते हैं) पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण तय कर सकती है, लेकिन 50% से ऊपर जाने के लिए इंद्रा साहनी (1992) में जो “असाधारण परिस्थिति” कही गई है, उसका निर्धारण सिर्फ मुख्यमंत्री या सरकार के कहने से नहीं हो जाता। यहीं पर गलती हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने “असाधारण परिस्थिति” का निर्धारण किए बिना ही, जल्दबाजी में, पॉलिटिकल फायदे के लिए, 27% ओबीसी आरक्षण लागू कर दिया। शायद उन्होंने सोचा होगा कि जब कोई पॉलिटिकल पार्टी को आपत्ति नहीं है तो फिर कोई प्रॉब्लम ही नहीं होगी। राहुल गांधी ने भी अपने पत्र में ऐसा ही लिखा है, लेकिन वह समझ नहीं पाए कि, एक आम आदमी भी इस प्रावधान को कोर्ट में चुनौती दे सकता है। जैसे ही कमलनाथ ने आधा अधूरा प्रावधान लागू किया, कोर्ट में उसको चैलेंज कर दिया गया। 

कमलनाथ सरकार को क्या करना चाहिए था

  • सरकार (मुख्यमंत्री की अगुवाई में) डेटा इकट्ठा करती, आयोग बैठाती।
  • अध्यादेश जारी करती या विधानसभा से कानून पास करवाती। 
  • इसके बाद “असाधारण परिस्थिति” को प्रमाणित करने के लिए, कानूनी को न्यायालय के सामने अंतिम निर्णय हेतु प्रस्तुत करती। 
  • न्यायालय द्वारा “असाधारण परिस्थिति” मां लिए जाने के बाद कानून लागू करती तो फिर कोई उसको चैलेंज नहीं कर पाता। 

तो फिर यह 13% HOLD क्या है

मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आरक्षण में 13% HOLD, एक ऐसी गड़बड़ी है जो तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा राजनीतिक दबाव में की गई। जिन पदों को HOLD किया गया है वह अनिश्चितकाल के लिए HOLD नहीं रह सकते क्योंकि शासन की भर्ती प्रक्रिया नीति में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है। इसका मतलब हुआ की 13% पद जिनको HOLD कहा जा रहा है एक्चुअल में रिक्त पद हैं, जो आने वाले दिनों में, निर्धारित साइकिल के अनुसार भरे जा रहे हैं। सीधी सरल बात है, यदि एक सरकारी कर्मचारी रिटायर हुआ है तो दूसरे सरकारी कर्मचारी की भर्ती करनी होगी। 13% HOLD कैसे कर सकते हैं। यह तो बस रिजल्ट में दिखाई देने वाला आंकड़ा है। 

उम्मीद है बात समझ में आ गई होगी और श्री राहुल गांधी को भी समझ में आ जाना चाहिए कि यदि समय रहते अपने मुख्यमंत्री कमलनाथ के कान पकड़ लिए होते, तो आज मध्य प्रदेश में पिछड़ा वर्ग के युवाओं को 13% HOLD वाले ट्रॉमा से नहीं गुजरना पड़ता है।

तो क्या मोहन यादव कुछ नहीं कर सकते

मध्य प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री होने के नाते मोहन यादव अपनी तरफ से हर संभव कोशिश कर रहे हैं। राज्य का मुख्यमंत्री संविधान नहीं बदल सकता, सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित किया गया न्याय का सिद्धांत नहीं बदल सकता, लेकिन फिर भी उन्होंने कोशिश की। सभी पक्षों को बुलाकर रणनीति समझाई कि किस प्रकार 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लागू करवाया जा सकता है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को बुलाया, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को बुलाया। सबको उनकी भूमिका समझाई लेकिन कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों एवं जनता के सामने ओबीसी आरक्षण की मांग करते हुए दिखाई देने वाले विद्वानों ने मोहन की रणनीति पर काम ही नहीं किया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उनको लगता था कि यदि मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण लागू हो गया तो इसका श्रेय डॉ मोहन यादव को मिल जाएगा। विपक्ष के लोगों को युवाओं के भविष्य की चिंता नहीं है, अपनी पॉलिटिक्स की चिंता है। इसीलिए 27% ओबीसी आरक्षण का हल नहीं निकाला जाता है, बल्कि इस आग को समय-समय पर भड़काया जाता है। जैसे आज राहुल गांधी ने एक चिट्ठी लिखकर आग में घी डाल दिया। बड़ी चतुराई के साथ, यह नहीं लिखा कि आप जो भी निर्णय लेंगे, कांग्रेस पार्टी आपके साथ है। जीतू पटवारी और उमंग सिंघार बात का बतंगड़ नहीं बनाएंगे।

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