जबलपुर, 4 अगस्त 2026: मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण के मामले में फाइनल डिबेट के दौरान आज एक बड़ा अच्छा मोड़ आया। ओबीसी पक्ष की अधिवक्ता श्री रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कहा कि ठीक है, यदि जाति आधारित आरक्षण में विसंगति की स्थिति है, यदि कुछ लोगों को जाति आधारित आरक्षण से आपत्ति है, तो जाति आधारित आरक्षण खत्म कर दो, लेकिन एक नियम बना दो। सरकारी नौकरी केवल उनका मिलेगी जिन्होंने सरकारी स्कूल से शिक्षा ग्रहण की है। मतलब केवल सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों को ही सरकारी कॉलेज में एडमिशन और सरकारी नौकरी में एलिजिबिलिटी दी जाएगी।
इस चर्चा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
आरक्षण की जगह नया नियम: अधिवक्ता ठाकुर ने सुझाव दिया कि यदि समाज के कुछ वर्गों को आरक्षण से समस्या है, तो सरकार को आरक्षण समाप्त कर एक नया नियम बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार यह प्रावधान करे कि केवल उन्हीं छात्रों को सरकारी नौकरी (Government Job) दी जाएगी जिन्होंने कक्षा 1 से 12 तक की शिक्षा सरकारी स्कूलों (Government Schools) में प्राप्त की है।
शिक्षा में सुधार और समानता: अधिवक्ता का तर्क था कि इस नियम के लागू होने से नेताओं, मंत्रियों और बड़े अधिकारियों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाएंगे। इससे सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति में सुधार होगा, शिक्षा में समानता आएगी और फिर शायद आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।
विरोध का अभाव: उन्होंने दावा किया कि यदि सरकार ऐसा साहसिक निर्णय लेती है, तो समाज का कोई भी वर्ग इसका विरोध नहीं करेगा।
न्यायाधीश की प्रतिक्रिया: इस सुझाव पर जस्टिस ने भी सहमति जताते हुए कहा कि यह एक विचारणीय बात है, हालांकि वर्तमान में सरकारी स्कूलों का स्तर बहुत खराब है। जस्टिस ने ग्वालियर में अपने कार्यकाल के दौरान शुरू की गई 'विद्यादान' जैसी योजनाओं का भी जिक्र किया, जिसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को सुधारना और बच्चों को मोटिवेट करना था।
अधिवक्ता ने यह दलील तब दी जब कोर्ट में ओबीसी वर्ग की योग्यता (Merit) और उनके साथ हुए ऐतिहासिक भेदभाव पर चर्चा हो रही थी।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में ओबीसी आरक्षण मामले में 14वें दिन की सुनवाई
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में ओबीसी आरक्षण (OBC Reservation) से जुड़े प्रकरणों की सुनवाई अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। 4 अगस्त 2026 को इस मामले की 14वीं दिन की सुनवाई हुई, जिसमें जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष बेंच ने वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर की दलीलों को सुना। इस दौरान अदालत में न केवल कानूनी पहलुओं पर चर्चा हुई, बल्कि पिछड़े वर्गों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय (Historical Injustice) और वर्तमान भर्ती प्रक्रियाओं में व्याप्त विसंगतियों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए कल अंतिम सुनवाई होने की संभावना है।
Historical discrimination against OBC Shudra varna in Hindu scriptures
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ने महाजन आयोग की रिपोर्ट (Mahajan Commission Report) के अध्यायों का हवाला देते हुए बताया कि ओबीसी की समस्त जातियां हिंदू धर्म ग्रंथों में 'शूद्र' वर्ण के रूप में वर्णित हैं। उन्होंने मनुस्मृति और अन्य स्मृतियों का संदर्भ देते हुए कोर्ट को अवगत कराया कि कैसे सदियों तक इन वर्गों को शिक्षा और संपत्ति के अधिकारों से वंचित रखा गया। अधिवक्ता ने ऋषि शम्बूक, एकलव्य और छत्रपति शिवाजी महाराज के उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि योग्यता होने के बावजूद जाति के आधार पर इन वर्गों का दमन किया गया। उन्होंने तर्क दिया कि इसी ऐतिहासिक भेदभाव के कारण आज इन वर्गों को समाज की मुख्यधारा (Mainstream) में लाने के लिए आरक्षण अनिवार्य है।
Quantifiable data and OBC creamy layer income limit criteria in Madhya Pradesh
अदालत में Quantifiable Data (मात्रात्मक डेटा) की आवश्यकता पर भी बहस हुई। अधिवक्ता ठाकुर ने स्पष्ट किया कि ओबीसी का संपूर्ण डेटा धर्म ग्रंथों और पूर्व की आयोग रिपोर्टों में पहले से ही मौजूद है, जिसे मंडल और महाजन आयोग ने संग्रहित किया है। मध्य प्रदेश में ओबीसी की आबादी 51% से 60% के बीच होने का अनुमान है, जबकि आयोग ने केवल 45 जिलों के डेटा के आधार पर 92 जातियों को सूचीबद्ध किया है। इसके अलावा, क्रीमी लेयर (Creamy Layer) की पहचान के लिए 8 लाख रुपये की वार्षिक आय की सीमा निर्धारित है, और इसके प्रमाण पत्र जारी करने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की है, न कि किसी विशेष कमीशन की।
Higher OBC cut off marks vs General category in MP recruitment results
सुनवाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सरकारी भर्तियों में हो रहे भेदभाव पर केंद्रित रहा। अधिवक्ता ने दस्तावेजों के साथ कोर्ट को बताया कि ओबीसी के कट-ऑफ अंक (Cut-off Marks) अक्सर सामान्य वर्ग (Unreserved) से भी अधिक होते हैं। उदाहरण के तौर पर, स्टेनोग्राफर भर्ती में ओबीसी का कट-ऑफ 81 था, जबकि सामान्य वर्ग का 77 रहा। यह इस बात का प्रमाण है कि OBC Merit में आगे हैं, फिर भी उन्हें अनारक्षित सीटों पर चयनित होने से रोकने के लिए साक्षात्कार (Interview) में कम अंक देने जैसे हथकंडे अपनाए जाते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भर्ती प्रक्रियाओं में माइग्रेशन (Migration) के नियमों को सही ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है।
MP Government 27 percent OBC reservation law and legal controversy
मध्य प्रदेश की वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली पर भी तीखे सवाल उठाए गए। अधिवक्ता ने बताया कि जिस सरकार ने 27% ओबीसी आरक्षण का कानून बनाया था, उसी ने बाद में हाई कोर्ट में आवेदन देकर केवल 14% आरक्षण के साथ भर्ती की अनुमति मांगी। सरकार द्वारा अपनाए गए इस रुख को ओबीसी आरक्षण विरोधी करार दिया गया है। जब भी हाई कोर्ट इन मामलों को अंतिम रूप से तय करने के लिए सक्रिय हुई, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरण याचिकाएं (Transfer Petitions) लगाकर प्रक्रिया को लंबा खींचने का प्रयास किया।
Inclusion of Brahmins and LGBT community in OBC list Madhya Pradesh
सुनवाई में एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि मध्य प्रदेश के ग्वालियर और चंबल संभाग में लगभग 40% ब्राह्मण आबादी (जैसे बैरागी, त्यागी, गिरी, गोस्वामी आदि) को ओबीसी की सूची में शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त, हाल के समय में LGBT समुदाय को भी ओबीसी वर्ग में स्थान दिया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि यदि सरकार को आरक्षण से समाज के कुछ वर्गों की नाराजगी का डर है, तो उसे एक नया नियम बनाना चाहिए।
Removing reservation through mandatory government school education rule
आरक्षण के स्थायी समाधान के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता ने एक क्रांतिकारी सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि सरकार एक नियम बना सकती है कि "केवल वही छात्र सरकारी नौकरी के पात्र होंगे जिन्होंने कक्षा 1 से 12 तक की शिक्षा सरकारी स्कूलों (Government Schools) में प्राप्त की है"। यदि ऐसा होता है, तो नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे, जिससे शिक्षा के स्तर में सुधार होगा और समाज में समानता आएगी। उन्होंने दावा किया कि इस फैसले का कोई भी वर्ग विरोध नहीं करेगा और तब शायद आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।
Social impact of pending OBC reservation and student suicides in MP
अंत में, अधिवक्ता ने लंबित आरक्षण विवाद के मानवीय पहलुओं को उजागर किया। उन्होंने बताया कि 2019 से 2025 के बीच मध्य प्रदेश के 37 विभागों की भर्तियों में लगभग 60-65 हजार अभ्यर्थी प्रभावित हुए हैं। इस अनिश्चितता के कारण अब तक 50 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या (Suicide) कर ली है और कई परिवारों में अलगाव की स्थिति पैदा हो गई है। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि 51% आबादी के साथ न्याय करते हुए 27% आरक्षण को बरकरार (Upheld) रखा जाए।

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