अब बैंक की तरह किसी भी पुलिस थाने में मामला दर्ज करवा सकते हैं: BNSS IMP Section 173

Updesh Awasthee
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 ने एक तरफ पुलिस को जिम्मेदार तो दूसरी तरफ आम नागरिक की कई समस्याओं का समाधान कर दिया है। पहले कई बार पुलिस थानों के बीच सीमा विवाद हो जाता था। पीड़ित को समझ में ही नहीं आता था कि वह कि पुलिस थाने में मामला दर्ज करवाए। पुलिस मामला दर्ज करने से मना कर देती थी, कहती थी कि यह हमारे थाने का मामला नहीं है, लेकिन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 में धारा 173 का प्रावधान होने के कारण अब पुलिस ऐसा कुछ भी नहीं कर पाती है। यह धारा पूर्ववर्ती CrPC की धारा 154 का स्थान लेती है और इसमें कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। धारा 173 के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं: 

प्रथम सूचना का पंजीकरण (FIR): 

संज्ञेय अपराध से संबंधित प्रत्येक सूचना, यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक रूप से दी जाती है, तो उसे लेखबद्ध किया जाएगा और सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाया जाएगा। सूचना देने वाले व्यक्ति द्वारा उस पर हस्ताक्षर किए जाएंगे और इसका सार राज्य सरकार द्वारा निर्धारित पुस्तक में दर्ज किया जाएगा।

Zero FIR: अब बैंक की तरह पुलिस के किसी भी स्टेशन में FIR दर्ज करवा सकते हैं 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173-1 के अनुसार, Zero FIR के माध्यम से क्षेत्राधिकार की बाध्यता नहीं है। बिल्कुल वैसे ही जैसे बैंक में अब होम ब्रांच की बाध्यता नहीं है। आप अपने बैंक कि किसी भी ब्रांच से और किसी भी ATM से अपने जमा धन की निकासी कर सकते हैं। बिल्कुल वैसे ही यदि कोई अपराध हुआ है तो आप, किसी भी पुलिस थाने में सूचना दे सकते हैं जिसे "प्राथमिक सूचना प्रतिवेदन" (FIR) के तौर पर दर्ज किया जाएगा और जिस क्षेत्र में अपराध हुआ है, उस क्षेत्र के पुलिस थाने को भेज दिया जाएगा। इसे ही आमतौर पर 'जीरो एफआईआर' कहा जाता है। यदि आप जीरो एफआईआर के लिए कोई आवेदन कर रहे हैं, तो मेरा विधिक परामर्श यह होगा कि, आवेदन के अंत में यह अवश्य लिखें कि कृपया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173-1 के तहत ZERO FIR दर्ज करने का कष्ट करें। 

जीरो एफआईआर का एक उदाहरण:
मान लीजिए कि एक महिला दिल्ली (शहर 'A') से जयपुर (शहर 'B') की यात्रा कर रही है और रास्ते में उसके साथ किसी संज्ञेय अपराध (जैसे चोरी या शारीरिक हमला) की घटना होती है।
घटना का स्थान: अपराध दिल्ली और जयपुर के बीच किसी राजमार्ग पर हुआ, जो एक विशिष्ट थाने 'X' के अंतर्गत आता है।
पीड़िता जब जयपुर पहुँचती है, तो वह सीधे जयपुर के किसी भी नजदीकी पुलिस थाने में जाकर इस घटना की रिपोर्ट दर्ज कराती है।
BNSS की धारा 173(1): जयपुर का पुलिस अधिकारी यह कहकर रिपोर्ट लिखने से मना नहीं कर सकता कि "यह अपराध हमारे इलाके में नहीं हुआ है"। यदि वैसा करता है तो वह पुलिस अधिकारी BNSS की धारा 173(1) का उल्लंघन कर रहा है।

पुलिस उस सूचना को 'जीरो एफआईआर' के रूप में दर्ज करेगी। इसे 'जीरो' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें शुरुआत में कोई नियमित एफआईआर नंबर नहीं दिया जाता, बल्कि इसे केवल दर्ज कर लिया जाता है।

इसके बाद, जयपुर पुलिस उस एफआईआर को और प्रारंभिक साक्ष्यों को संबंधित पुलिस थाने 'X' को स्थानांतरित (Transfer) कर देगी, जहाँ अपराध वास्तव में हुआ था, ताकि आगे की नियमित जांच शुरू हो सके। 

इलेक्ट्रॉनिक संचार (E-FIR): 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173(1/2) के तहत इलेक्ट्रॉनिक संचार (जैसे ईमेल या व्हाट्सएप) के माध्यम से भी अपने साथ हुए अपराध की सूचना दी जा सकती है। इस प्रकार की सूचना को लीगल इनफॉरमेशन माना जाएगा और पुलिस द्वारा FIR दर्ज की जाएगी। इसके अलावा यदि आपके राज्य की पुलिस द्वारा कोई ऐसी वेबसाइट संचालित की जा रही है जहां पर eFIR की सुविधा है तो आप अपने साथ हुई घटना की शिकायत eFIR के माध्यम से भी कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में, सूचना देने वाले व्यक्ति को तीन दिनों के भीतर पुलिस थाने आकर उस पर हस्ताक्षर करने होंगे, तभी इसे रिकॉर्ड पर लिया जाएगा। इसका मतलब हुआ कि यदि आप किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से पुलिस को किसी अपराध की सूचना दे रहे हैं और चाहते हैं कि अपराध की प्रथम सूचना तत्काल पंजीकृत की जाए तो आपको अपने आवेदन के अंत में लिखना चाहिए, कृपया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173 1/2 के तहत मामला दर्ज करें।

महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान: 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173-1 में महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। यदि अपराध महिलाओं के विरुद्ध है (जैसे यौन उत्पीड़न या बलात्कार), तो ऐसी सूचना अधिमानतः एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज की जाएगी। यदि महिला पुलिस अधिकारी मौजूद नहीं है तो शासन की सेवा में उपलब्ध किसी अन्य महिला अधिकारी की उपस्थिति में दर्ज की जाएगी। मतलब यदि पुलिस विभाग में शिकायत के समय कोई महिला अधिकारी उपस्थित नहीं है तो किसी दूसरे विभाग की महिला अधिकारी, सामान्य तौर पर नायब तहसीलदार, तहसीलदार, डिप्टी कलेक्टर, SDM अथवा महिला प्रोफेसर के सामने पुलिस के पुरुष अधिकारी द्वारा FIR दर्ज की जाएगी।

दिव्यांग व्यक्तियों के लिए प्रक्रिया: 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 173 के अनुसार यदि पीड़ित व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम है, तो सूचना उसके निवास स्थान पर या उसकी पसंद के किसी सुविधाजनक स्थान पर दर्ज की जाएगी। इसके अलावा, इस प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की जाएगी और एक दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता ली जाएगी।

FIR की निःशुल्क प्रति प्राप्त करने का अधिकार

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173-2 उपधारा 1 के तहत एफआईआर दर्ज होने के बाद, उसकी एक प्रति सूचना देने वाले व्यक्ति को तुरंत और निःशुल्क प्रदान की जाएगी।

FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry)

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173-3 के तहत, यदि कोई अपराध 3 वर्ष से अधिक लेकिन 7 वर्ष से कम की सजा वाला है, तो पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से पहले 14 दिनों के भीतर एक प्रारंभिक जांच कर सकता है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि प्रथम दृष्टया (prima facie) कोई मामला बनता है या नहीं। इस दौरान पुलिस थाने का भार साधक अधिकारी इस बात का ध्यान रखेगा कि धारा 175 का उल्लंघन नहीं हो रहा है।

पुलिस द्वारा इनकार पर कार्रवाई: यदि पुलिस अधिकारी सूचना दर्ज करने से मना करता है, तो पीड़ित व्यक्ति सूचना का सार लिखित रूप में या डाक द्वारा संबंधित पुलिस अधीक्षक (SP) को भेज सकता है। यदि एसपी संतुष्ट हैं कि सूचना में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो वे स्वयं जांच कर सकते हैं या किसी अधीनस्थ अधिकारी को जांच का निर्देश दे सकते हैं। लेखक: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार।)

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