बालाघाट मामला: इसे कहते हैं जनता की सरकार का 100% सच्चा उदाहरण, 630 बच्चों की जान बचाई

Updesh Awasthee
भोपाल, 17 अगस्त 2026:
दुनिया में जिसने भी लोकतंत्र का विचार प्रतिपादित किया था उसने शायद यही कल्पना की होगी जो बालाघाट में दिखाई दे रही है। जनता की सरकार; जिसमें जनता और सरकार एक दूसरे का हाथ पकड़ कर काम कर रहे हैं, और इसका कितना सुखद परिणाम आया है। 35 साल तक नक्सल पीड़ित रहे 10 गांव के 980 घर आज स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे में हैं। 630 बच्चों की जान बचा ली गई है और यह भी सुनिश्चित कर लिया है कि, भविष्य में ऐसी कोई स्थिति नहीं बन पाएगी। सब कुछ इसलिए संभव हुआ क्योंकि, बालाघाट की जनता और सभी सरकारी कर्मचारियों ने एक टीम के रूप में काम किया। 

बिरसा ब्लॉक में नक्सलवाद कितना शक्तिशाली था?

मामला मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित बिरसा ब्लॉक का है। 40 साल पहले शुरू हुआ नक्सलवाद यहां पर इतना अधिक ताकतवर हो गया था कि, दर्जनों पुलिस जवानों की सामूहिक हत्याओं के बाद 15-16 दिसंबर 1999 की रात मध्य प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री लिखीराम कावरे को उनके घर से निकालकर सबके सामने मार डाला गया था। 11 दिसंबर 2025 को अंतिम दो सक्रिय नक्सलियों (दीपक उर्फ मंगल उईके और रोहित) के आत्मसमर्पण के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बालाघाट (और पूरे मध्य प्रदेश) को नक्सल-मुक्त घोषित किया, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं था बल्कि एक नई चुनौती की शुरुआत थी। 

नक्सली मुक्त ग्रामीण क्षेत्र की बड़ी समस्या

बिरसा ब्लॉक के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के आदिवासी नक्सली शिकंजे से मुक्त तो हो गए थे लेकिन इसके बाद क्या करना है, उनका कोई जानकारी नहीं थी। जिस दुनिया में हम और आप रहते हैं, उसके बारे में इन आदिवासियों को पता ही नहीं था। 30 साल से अधिक का समय हो गया, नक्सलवादियों ने यहां पर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को पहुंचने ही नहीं दिया। नक्सली शिकंजे से मुक्त हुए आदिवासियों को पता ही नहीं था कि, डॉक्टर और मास्टर कौन होते हैं। हर छोटी सी गलती पर नक्सली कठोर सजा देते थे, इसलिए नक्सल पीड़ित आदिवासियों के मन में बाहरी लोगों के प्रति एक स्वाभाविक डर की भावना थी। जब सरकारी कर्मचारियों ने ऐसे आदिवासियों से मिलने का प्रयास किया तो वह सफल नहीं हो पाए क्योंकि आदिवासी उनसे मिलने के लिए तैयारी नहीं थे। सरकारी कर्मचारियों को देखते ही जंगल में गायब हो जाते थे। 

लोकतंत्र की एक ऐसी कहानी, जो कोई नहीं सुनाइए

सरकारी सिस्टम पर सवाल उठाना लोकतंत्र में एक अधिकार है लेकिन समस्या को जड़ से मिटाने के लिए सरकार के साथ काम करना, यह लोकतंत्र की मूल अवधारणा है। सरकारी कर्मचारी विभिन्न विभागों में बंटे होते हैं। उनका एक दूसरे से संपर्क नहीं होता लेकिन बिरसा ब्लॉक में जब विषम परिस्थिति बनी तो सभी विभागों के सरकारी कर्मचारियों ने एक साथ मिलकर काम करना शुरू किया। यहां तक कि पुलिस के अधिकारी और आरक्षक भी स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए काम करने लगे लेकिन फिर भी आदिवासियों से संवाद स्थापित करना मुश्किल हो रहा था। तब बालाघाट की जनता ने दोषरोपण नहीं किया, क्योंकि उन्हें हालत पता हैं। पब्लिक ने सरकारी कर्मचारियों का सपोर्ट करना शुरू कर दिया। बालाघाट के आदिवासी, बालाघाट के नक्सल पीड़ित आदिवासियों और सरकार के बीच में सेतु बन गए। कम्युनिकेशन का माध्यम बन गए। बालाघाट के आदिवासियों ने, बालाघाट के नक्सल मुक्त आदिवासियों को स्वास्थ्य और शिक्षा के विषय में बताया और उन्हें सरकारी सेवाएं लेने के लिए कन्वेंस किया। यह नक्सल पीड़ित आदिवासियों को मुख्य धारा में शामिल करने का एक बड़ा आंदोलन है जो सफल हो रहा है, लेकिन शायद कभी किसी इतिहास की किताब में नहीं लिखा जाएगा। 

कर्मचारियों ने नौकरी दांव पर लगा दी

जनता की सरकार मतलब जनता और सरकार ने मिलकर मात्र 35 सप्ताह में 35 साल पुरानी बीमारी को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। आज जब बालाघाट के नक्सल प्रभावित रहे आदिवासी इलाकों के बच्चे बीमारियों से जूझ रहे हैं तो उनको तत्काल इलाज भी मिल रहा है। गंभीर रूप से बीमार 169 बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया गया। इसमें से 125 बच्चे पूरी तरह से स्वस्थ हो गए और उनको डिस्चार्ज कर दिया गया है। 44 बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं लेकिन आउट ऑफ डेंजर हैं। 461 बच्चों के पेरेंट्स उनको अस्पताल में भर्ती करने के लिए तैयार नहीं थे। मेडिकल टीम ने उनके घर पर इलाज किया, सभी खतरे से बाहर हैं। हालांकि ऐसा करना कर्मचारियों की नौकरी के लिए खतरा था लेकिन फिर भी बच्चों की जान बचाने के लिए कर्मचारियों ने नौकरी दांव पर लगा दी। 

बिरसा ब्लॉक: भारत में नंबर वन 

मध्य प्रदेश शासन के स्वास्थ्य संचालनालय ने आज घोषणा की है कि, गंभीर रूप से नक्सल पीड़ित रहे क्षेत्र के 10 गांव के 980 घर, स्वास्थ्य के सुरक्षा कवच में सुरक्षित हैं। सरकार इस तरह का कोई रिकॉर्ड नहीं बना रही है और किसी को कोई अवार्ड भी नहीं मिलेगा लेकिन आप कह सकते हैं कि, बालाघाट मध्य प्रदेश के लोगों ने भारत में सबसे पहले नक्सल पीड़ित लोगों को मुख्य धारा में शामिल किया। अब बालाघाट का बिरसा ब्लॉक न केवल नक्सल मुक्त क्षेत्र है बल्कि मुख्य धारा में शामिल हो चुका है।

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