नई दिल्ली, 31 जुलाई, 2026: यह मामला जिला न्यायालयों में काम करने वाले वकीलों, और LLB स्टूडेंट्स के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह मामला प्रमाणित करता है कि, सिर्फ कानून नहीं बल्कि कानूनी प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। जिले की कोर्ट में एक कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया इसलिए जिला और हाई कोर्ट द्वारा हत्या का दोषी घोषित किया गया अपराधी, सुप्रीम कोर्ट से रिहा हो गया। यह मामला सीआरपीसी की धारा 299 जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 335 हो गई है, के बारे में है।
मामले की पूरी कहानी: 27 साल पुराना विवाद
यह मामला 1 अप्रैल, 1999 को हुई एक हत्या की घटना से शुरू हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, कुछ गवाह एक मेले से लौट रहे थे, जब उन्होंने देखा कि आरोपी महेंद्र सिंह एक व्यक्ति के सीने पर बैठकर उसका गला घोंट रहा है। दूसरा आरोपी पास में खड़ा उसे उकसा रहा था और राहगीरों को डरा-धमका रहा था। डर के मारे गवाह वहां से भाग गए। घटना के बाद, मुख्य आरोपी महेंद्र सिंह फरार हो गया, जबकि दूसरे आरोपी पर मुकदमा चलाया गया और अंततः उसे बरी कर दिया गया। महेंद्र सिंह को लगभग 18 साल बाद, 11 सितंबर, 2017 को गिरफ्तार किया गया और उस पर हत्या का मुकदमा शुरू हुआ।
मुकदमे में कानूनी पेंच और गवाहों की कमी
जब महेंद्र सिंह का मुकदमा शुरू हुआ, तब तक मामले का सबसे महत्वपूर्ण गवाह (PW1), जिसने घटना को स्पष्ट रूप से देखा था, उसकी मृत्यु हो चुकी थी। अन्य चश्मदीद गवाह अदालत में मुकर गए (hostile हो गए)। एक अन्य गवाह (PW2) ने हमले की बात तो स्वीकार की, लेकिन वह महेंद्र सिंह की पहचान नहीं कर सका, क्योंकि गांव में उसी नाम के दो व्यक्ति थे।
निचली अदालत और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मृत गवाह (PW1) के उन बयानों पर भरोसा किया जो उसने सालों पहले दूसरे आरोपी के मुकदमे के दौरान दिए थे। इन अदालतों ने धारा 299 Cr.PC का हवाला देते हुए महेंद्र सिंह को दोषी ठहराया था।
सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या: धारा 299 Cr.PC (नई धारा 335 BNSS) के अनिवार्य नियम
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि धारा 299 Cr.PC एक अपवाद है और इसका उपयोग करने के लिए कुछ 'न्यायिक तथ्यों' (jurisdictional facts) का सिद्ध होना अनिवार्य है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ उसकी अनुपस्थिति में दिए गए बयान का उपयोग करने से पहले अदालत को दो बातों पर संतुष्ट होना चाहिए और इसका लिखित आदेश (Order) पारित करना चाहिए:
- आरोपी फरार (absconding) है।
- उसे तुरंत गिरफ्तार किए जाने की कोई संभावना नहीं है।
अदालत ने कहा कि ये दोनों शर्तें एक साथ (conjunctively) पूरी होनी चाहिए। इस मामले में, 1999 में जब मामला अलग किया गया था (split-up), तब अदालत ने धारा 299 के तहत ऐसा कोई विशेष आदेश पारित नहीं किया था कि महेंद्र सिंह के तुरंत पकड़े जाने की संभावना नहीं है।
अदालत का फैसला और न्याय का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि आरोपी का गवाहों से जिरह (cross-examine) करने का अधिकार एक अपरिहार्य अधिकार (indefeasible right) है। धारा 299 केवल एक विशेष परिस्थिति में इस अधिकार से वंचित करती है, लेकिन उसके लिए कानून की प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
चूंकि 1999 में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था, इसलिए मृत गवाह के पुराने बयानों को महेंद्र सिंह के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। मुख्य गवाह के बयान हटने के बाद, अभियोजन पक्ष के पास उसे दोषी ठहराने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं बचा।
परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने महेंद्र सिंह की अपील स्वीकार कर ली और उसे सभी आरोपों से बरी करते हुए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि "कोई भी व्यक्ति अपने ही द्वारा किए गए गलत कार्य (फरार होने) का लाभ नहीं उठा सकता", लेकिन साथ ही राज्य को भी न्याय सुनिश्चित करने के लिए स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करना होगा।
न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला की पीठ ने इस मामले में धारा 299 दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.PC) (जो अब बदलकर नई धारा (BNSS 335) हो गई है) की बारीकियों को बड़ी गहराई से समझाया। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि पत्रकार एवं सलाहकार)।

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