RTE के तहत शिक्षक भर्ती हम नहीं करेंगे, कानून का पालन हुआ या नहीं, हम नहीं देखेंगे: केंद्रीय मंत्री

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 30 जुलाई 2026:
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री श्री जयंत चौधरी ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में बड़ी ही बेशर्मी के साथ ही बताया कि स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति उनका नहीं बल्कि राज्य सरकारों का काम है। मतलब शिक्षा का अधिकार अधिनियम केंद्र ने बनाया, 30 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का नियम केंद्र ने बनाया, लेकिन राज्य नियम का पालन कर रहे हैं या नहीं? यदि नहीं कर रहे तो उनसे नियम का पालन करवाना, मंत्री जी कहते हैं यह हमारा काम नहीं है। स्कूल में समान और इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए केंद्र करोड़ों रुपए देता है, लेकिन उसी स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए सवाल तक नहीं करता? 

रिक्तियों का गणित और राज्यों का अधिकार 

केंद्रीय मंत्री का कहना है कि, स्कूलों में शिक्षकों के पद सेवानिवृत्ति, इस्तीफे, नए पदों के सृजन और शिक्षकों की तैनाती के पुनर्गठन जैसे कारणों से खाली होते हैं। हालांकि, इन रिक्तियों को भरने की कोई निश्चित केंद्रीय समय-सीमा नहीं है; रिक्तियों को भरने की समय-सीमा पूरी तरह से संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा ही तय की जाती है। केंद्र सरकार की भूमिका केवल राज्यों को पारदर्शी और योग्यता-आधारित भर्ती प्रक्रिया अपनाने की 'सलाह' देने और नियमित बैठकों के माध्यम से प्रगति की समीक्षा करने तक सीमित है। 
मतलब केंद्रीय मंत्री जी ने स्पष्ट कर दिया कि, राज्य सरकार शिक्षकों की नियुक्ति, नवीन पदों के सृजन और रिटायरमेंट के मामले में मनमानी कर सकती है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बावजूद इस मामले में हम कुछ नहीं करेंगे।

क्या कहते हैं आंकड़े? 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुसार, हर स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) 30:1 से कम होना चाहिए। ताज़ा यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक:
राष्ट्रीय स्तर पर PTR: आधारभूत चरण में 10, प्रारंभिक चरण में 12, मध्य चरण में 17 और माध्यमिक चरण में 21 है।
राज्यों की स्थिति: तेलंगाना (11, 10, 11, 14) और आंध्र प्रदेश (11, 12, 16, 15) जैसे राज्यों में यह अनुपात निर्धारित मानकों के भीतर है।
मतलब भारत के ज्यादातर राज्य ऐसे हैं जहां पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम का पालन करवाने के लिए केंद्र की तरफ से राज्य सरकारों को करोड़ों रुपए की फंडिंग तो की जा रही है लेकिन छात्र-शिक्षक अनुपात पर सवाल भी नहीं किया जा रहा है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम का एक अध्याय ऐसा है, जिसका उल्लंघन किया जा रहा है और कानून बनाने वाले कानून को नजरअंदाज कर रहे हैं। 

छात्र-शिक्षक अनुपात के पैसों से स्कूल बनाते हैं, सामान खरीदते हैं

केंद्र सरकार 'समग्र शिक्षा' योजना के माध्यम से राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है ताकि 'मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009' के तहत शिक्षक-छात्र अनुपात बना रहे। इसी योजना के तहत नए स्कूल खोलने और मौजूदा स्कूलों की इमारतों के निर्माण के लिए भी फंड दिया जाता है, लेकिन स्कूलों को खोलने, बंद करने या उनके विलय का अंतिम फैसला राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में ही आता है। 

कुल मिलाकर राज्यसभा में केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि, शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत छात्र-शिक्षक अनुपात का पालन करने हेतु वह कोई कदम नहीं उठाने जा रहे हैं। स्कूल की बिल्डिंग और स्मार्ट क्लास के लिए करोड़ों रुपए की फंडिंग करेंगे, लेकिन या नहीं देखेंगे कि उस स्कूल में बच्चों को पढ़ने के लिए टीचर है या नहीं। यही कारण है कि आए दिन स्मार्ट क्लास रूम में टीवी पर भोजपुरी गाने देखते हुए बच्चों के वीडियो वायरल होते रहते हैं।

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