दतिया कांड के कारण भाजपा भारी प्रेशर में थी, दादा जीती बाजी हार गए

Updesh Awasthee
भोपाल समाचार, 12 जुलाई 2026
: वह 1971 वाली भारत-पाकिस्तान की लड़ाई आपको याद है, इसके बारे में कहा जाता है कि भारतीय सेना मैदान में जीती लेकिन भारत सरकार टेबल पर हार गई। दतिया कांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। अपन सही या गलत की बात नहीं कर रहे, पॉलिटिक्स में एक तीसरा एंगल भी होता है और तीसरे एंगल पर लगा सीसीटीवी कैमरा बता रहा है कि दतिया कांड के कारण भाजपा भारी प्रेशर में थी लेकिन "दादा" समझ नहीं पाए और जीती बाजी हार गए। कोई और समझे या ना समझे लेकिन इस समीक्षा में जो नहीं लिखी जा रही है वह बात नरोत्तम मिश्रा के समर्थक बड़ी आसानी से समझ जाएंगे।

Datia Case Put BJP Under Pressure, How 'Dada' Lost a Winning Battle: A Political Review

इस समीक्षा में अपन इस पूरे घटनाक्रम को कानून और भाजपा के अनुशासन की दृष्टि से नहीं बल्कि राजनीति की दृष्टि से देखेंगे। राजनीति कई बार ब्लैक और व्हाइट के बीच में ग्रे लाइन पर चलती है, और यदि आप राजनीति पर नजर रखते हैं तो आप जानते ही हैं कि, ग्रे लाइन पर सबसे ज्यादा भीड़ होती है। ग्रीन लाइन पर कुछ ऐसा होता जो गलत दिखाता तो है, लेकिन उसको गलत साबित नहीं किया जा सकता बल्कि यह गुंजाइश रहती है कि उसको कभी भी सही साबित किया जा सके। दतिया में कार्यकर्ताओं ने जो कुछ भी किया, वह नरोत्तम मिश्रा की वजह से नहीं बल्कि किसी और वजह से किया, इस टॉपिक पर आने वाले दिनों में विस्तार से बात करेंगे। फिलहाल राजनीति के चश्मे से घटना की समीक्षा करते हैं। 

दादा चाहते तो दामोदर उनके बूथ एजेंट होते
पार्टी ने जिसको टिकट दिया उसके बारे में कहा गया कि वह संगठन का व्यक्ति है। जबकि दतिया में पूरा का पूरा संगठन ही संगठन के व्यक्ति के खिलाफ इस्तीफा दे रहा था। सड़कों पर उतर आया था। संगठन के कार्यालय पर, संगठन के बागियों का कब्जा हो गया था। संगठन के जिला अध्यक्ष से लेकर बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं ने संगठन के इस निर्णय का विरोध किया था। दूसरी तरफ हालत यह थी कि, लखनऊ में पंडित जी के स्वागत में की थाली सजाई जाने लगी थी। मध्य प्रदेश में कांग्रेसियों के मन में लड्डू फूट रहे थे। नरोत्तम मिश्रा जैसा फायर ब्रांड मध्य प्रदेश में सबको चाहिए, मतलब कोई बड़ी बात नहीं कि, यदि दादा चाहते तो दामोदर उनके बूथ एजेंट होते।

एक तरफ संगठन के व्यक्ति को टिकट दिया गया और दूसरी तरफ दतिया में संगठन ही नहीं बचा था
भाजपा के प्रदेश कार्यालय में किसी को भी इस प्रकार की प्रतिक्रिया की उम्मीद ही नहीं थी। पार्टी के प्रवक्ताओं ने पत्रकारों के फोन उठाना बंद कर दिया था। पार्टी में यह प्रेशर इसलिए था क्योंकि, एक तरफ संगठन के व्यक्ति को टिकट दिया गया और दूसरी तरफ दतिया में संगठन ही नहीं बचा था। इतने प्रेशर के बावजूद संगठन ने नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता को अनुशासन की सफेद पट्टी पर लाकर खड़ा कर दिया। भारी तनाव में होने के बावजूद, संगठन के नेताओं के चेहरे पर तनाव नहीं था। संगठन के जिन नेताओं के पास पत्रकारों के सवालों के जवाब नहीं थे, वह नरोत्तम मिश्रा को अपने सवालों में उलझा रहे थे और नरोत्तम मिश्रा के सवालों का ऐसा जवाब दे रहे थे ताकि नरोत्तम मिश्रा प्रेशर में आ जाए। हुआ भी बिल्कुल वैसा ही। 

नरोत्तम मिश्रा अवसर का बड़ा लाभ उठा सकते थे

श्री कैलाश विजयवर्गीय ने बड़ी चतुराई के साथ चुनिंदा पत्रकारों के चुनिंदा सवालों का जवाब देते हुए कहा कि, संगठन में टिकट बदलने की परंपरा नहीं है जबकि उनको खुद पता कि कई बार ऐसा हो चुका है। हालांकि अपनी नापतोल में जो दिखाई दिया उसके हिसाब से, यह सही है कि दतिया का टिकट बदला नहीं जाता लेकिन यह भी सही है कि, नरोत्तम मिश्रा अवसर का बड़ा लाभ उठा सकते थे। आज दिल्ली के दौरे के बाद नरोत्तम मिश्रा पूरे साहस के साथ पत्रकारों के सवालों का जवाब तो दे रहे हैं परंतु यह भी स्पष्ट हो रहा है कि उन्होंने बिना शर्त सरेंडर कर दिया है। और अंत में.. राजनीति की समीक्षा कर रहे हैं तो यह भी कह सकते हैं, यदि दतिया में लगी आग को चूल्हे की दीवारों के बीच अनुशासित कर दिया जाता, तो बड़ा स्वादिष्ट मटर पनीर बनाया जा सकता था। शिवराज सिंह सरकार के संकट मोचक पर जब खुद संकट आया तो....। 
इति श्री उपदेश अवस्थी कृत दतिया 11/7 राजनीतिक समीक्षा, प्रथम अध्याय सम्पूर्णम्

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