नई दिल्ली, 24 जून 2026: हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने इसराफिल @ पप्पू बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जहाँ अदालत ने जालसाजी (forgery) के एक मामले में सजा की अवधि को लेकर उदार रुख अपनाया है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने आरोपी की दोषसिद्धि (conviction) को बरकरार रखा, लेकिन उसकी 5 साल की कठोर सजा को घटाकर जेल में बिताई गई अवधि (period already undergone) तक सीमित कर दिया है। मतलब हाई कोर्ट के फैसले के साथ ही पप्पू जेल से रहा हो गया।
Forged Bhu Adhikar Rin Pustika Case Details and IPC Sections
यह कानूनी विवाद साल 2014 में शुरू हुआ था, जब रीवा, मध्य प्रदेश की एक अदालत में आरोपी इसराफिल ने एक अन्य व्यक्ति की जमानत के लिए फर्जी 'भू-अधिकार ऋण पुस्तिका' (Land Rights and Loan Book) पेश की थी। कोर्ट में स्कूटनी के दौरान मजिस्ट्रेट ने पाया कि दस्तावेजों के पेज नंबरों में गड़बड़ी थी, जिससे उनके असली होने पर संदेह हुआ। इसके बाद पुलिस जांच में यह दस्तावेज पूरी तरह फर्जी पाया गया और आरोपी पर IPC Sections 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।
Trial Court Conviction and Madhya Pradesh High Court Verdict
इस मामले में लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, 2024 में रीवा के एडिशनल सेशंस जज ने इसराफिल को दोषी पाते हुए 5 साल के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन 2025 में हाई कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए उसकी सजा बरकरार रखी। इसके बाद आरोपी ने Special Leave Petition (Criminal) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
Supreme Court Analysis on Proportionality Principle in Forgery Case
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में Proportionality Principle (अनुपातिकता का सिद्धांत) पर जोर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि न्यायिक कार्यवाही में फर्जी दस्तावेजों का उपयोग एक गंभीर अपराध है, लेकिन सजा देते समय अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों को संतुलित करना आवश्यक है। कोर्ट ने गौर किया कि यह कोई संगठित अपराध (Organized Crime) या बड़ा आर्थिक घोटाला नहीं था और जालसाजी को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ लिया गया था, जिससे कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ।
Final Order on Reduction of Sentence and Immediate Release
अंततः, उच्चतम न्यायालय ने आरोपी के साफ आपराधिक रिकॉर्ड (No Criminal Antecedents) और पिछले 10 वर्षों से चल रहे मानसिक तनाव को ध्यान में रखते हुए अपना आदेश सुनाया। चूंकि आरोपी पहले ही दो वर्ष से अधिक का समय जेल में बिता चुका था, कोर्ट ने इसे न्याय के हित में पर्याप्त सजा माना और उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया जुर्माना (Fine) यथावत रहेगा।

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