मध्य प्रदेश में दागी अधिकारियों को ऊंचे पदों की कमान देने पर हाई कोर्ट की रोक

Updesh Awasthee
जबलपुर, 18 जून 2026:
नियमों में अस्पष्टता तथा का लाभ उठाकर प्रशासनिक मनमानी के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने लैंडमार्क जजमेंट दिया है। हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि दागी अधिकारियों को उच्च पद का प्रभार देना भी न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है। अतः किसी भी दागी (भ्रष्टाचार के आरोपी) अधिकारी को संवेदनशील और उच्च पद की कमान नहीं दी जानी चाहिए।

Full Story of P.C. Verma vs State of MP PWD Bridge Zone Bhopal Case | प्रशासनिक मनमानी की पूरी कहानी

यह कानूनी विवाद याचिकाकर्ता पी.सी. वर्मा से संबंधित है, जो वर्तमान में लोक निर्माण विभाग (PWD) में अधीक्षण अभियंता (Superintending Engineer) के पद पर कार्यरत हैं और दिसंबर 2026 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। वर्मा को उनकी योग्यता और अनुभव के आधार पर जुलाई 2025 में मुख्य अभियंता (Chief Engineer), ब्रिज जोन, भोपाल का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। हालांकि, 29 अप्रैल 2026 को अचानक एक घटनाक्रम हुआ जिसमें प्रशासन की 'पूर्वनियोजित मानसिकता' दिखाई दी। शाम 17:05 बजे उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और उसके मात्र 3 घंटे के भीतर ही उनसे प्रभार वापस लेकर प्रतिवादी संख्या 4 (आर.के. मेहरा) को सौंप दिया गया। विशेष बात यह है कि प्रतिवादी संख्या 4 आर.के. मेहरा पहले से ही गंभीर भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोपों का सामना कर रहे हैं।

Arguments of Petitioner - Violation of the circular dated 22.07.2004

पी.सी. वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि राज्य सरकार का आदेश 22.07.2004 के उस सरकारी परिपत्र (Circular) का खुला उल्लंघन है, जो स्पष्ट रूप से कहता है कि जिन अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही या विभागीय जांच लंबित है, उन्हें उच्च पदों का अतिरिक्त प्रभार नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने न्यायालय को बताया कि प्रतिवादी संख्या 4 (आर.के. मेहरा) का सेवा रिकॉर्ड अत्यंत विवादास्पद है। उन पर सिवनी जिले में वैनगंगा नदी पर बने पुल के ढहने का आरोप है, जिससे सरकारी खजाने को लगभग 494.44 लाख रुपये की हानि हुई। इसके अतिरिक्त, ग्वालियर में 1,000 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण में भी उन पर 2.41 करोड़ रुपये के वित्तीय गबन के गंभीर आरोप हैं। 

Response of MP Government - Claim of administrative privilege

राज्य की ओर से महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि किसी भी कर्मचारी के पास अतिरिक्त प्रभार या 'चालू कार्यभार' (Current Duty Charge) बनाए रखने का कोई मौलिक या निहित अधिकार नहीं है। उन्होंने 'हरियाणा राज्य बनाम एस.एम. शर्मा' के मामले का हवाला देते हुए कहा कि प्रभार वापस लेने से याचिकाकर्ता की मूल सेवा शर्तों, वेतन या भत्तों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। सरकार ने वर्मा के प्रभार को वापस लेने को यह कहते हुए जायज ठहराया कि तकनीकी निविदाओं के मूल्यांकन में उनकी भूमिका 'संदिग्ध' पाई गई थी और उनके पद पर बने रहने से जांच प्रभावित हो सकती थी। प्रतिवादी संख्या 4 के बचाव में कहा गया कि विभाग के प्रमुख (Engineer-in-Chief) ने उनके पक्ष में क्लोजर रिपोर्ट की सिफारिश की है।

Legal Aspects of P.C. Verma Case MP PWD Recruitment Rules 1983 

कानूनी रूप से यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर किया गया था। न्यायालय ने इस मामले को 'मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग इंजीनियर-इन-चीफ और मुख्य अभियंता भर्ती और सेवा की शर्तें नियम, 1983' के आलोक में देखा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि प्रशासन के पास अस्थायी व्यवस्था करने की लचीलापन (Flexibility) है, लेकिन वह इसे नियमों के उल्लंघन के लिए 'चोर दरवाजे' (Backdoor entry) के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता। न्यायालय ने 'मैक्सिम नेमो जुडेक्स इन कॉसा सुआ' (Nemo judex in causa sua) यानी 'कोई भी व्यक्ति अपने मामले में स्वयं न्यायाधीश नहीं हो सकता' के सिद्धांत का उल्लेख किया, क्योंकि प्रतिवादी संख्या 4 को उसी कार्यालय का प्रभार दे दिया गया था जो उनके खिलाफ चल रही जांच की निगरानी कर रहा था।

MP High Court Final Order and Strict Remarks in WP 16652 of 2026 

माननीय न्यायाधीश विवेक कुमार सिंह ने राज्य सरकार के 29.04.2026 के आदेश को रद्द (Quashed) कर दिया। न्यायालय ने अपनी विशिष्ट टिप्पणी में कहा कि सरकार का यह कदम "न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोरने वाला" है। न्यायालय ने प्रमुख सचिव (PWD) को कड़ी चेतावनी दी कि वे न्यायालय के आदेशों को हल्के में न लें और भविष्य में ऐसे 'दागी' अधिकारियों को संवेदनशील पदों पर न बैठाएं। न्यायालय ने इसे 'कानून में द्वेष' (Malice in law) का उदाहरण माना क्योंकि वर्मा से प्रभार छीनने की पूरी प्रक्रिया केवल 3 घंटे में 'पूर्वनियोजित मानसिकता' के साथ पूरी की गई थी।

Directions Issued by Justice Vivek Kumar Singh in PWD Chief Engineer Case 

न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:-
  • मुख्य अभियंता (ब्रिज जोन, भोपाल) का प्रभार किसी ऐसे योग्य अधिकारी को दिया जाए जिसका सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक (Unblemished) हो।
  • प्रतिवादी संख्या 4 आर.के. मेहरा के खिलाफ चल रही सभी विभागीय जांचों को एक स्वतंत्र और सक्षम प्राधिकारी द्वारा जल्द से जल्द पूरा किया जाए।
  • जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, प्रतिवादी संख्या 4 आर.के. मेहरा को भोपाल जोन से बाहर रखा जाए।
  • याचिकाकर्ता (पी.सी. वर्मा) को जांच पूरी होने तक भोपाल ब्रिज जोन से बाहर प्रभारी मुख्य अभियंता के रूप में पदस्थ किया जाए।

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!