भोपाल, 18 जून 2026: मनुआभान टेकरी कांड तो आपको भी याद होगा। किस प्रकार आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली मासूम छात्रा के साथ दरिंदगी के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में भोपाल पुलिस की इन्वेस्टीगेशन, सीबीआई की इन्वेस्टीगेशन से ज्यादा सही पाई गई है। Bhopal Police Outperforms CBI, Life Imprisonment Awarded in Manuabhan Tekri Gang Rape Case. न्यायालय ने भोपाल पुलिस की इन्वेस्टिगेशन के आधार पर दोनों आरोपियों को ता-ज़िंदगी जेल की सजा सुनाई है। जबकि सीबीआई ने इस मामले में न्यायालय द्वारा घोषित अपराधियों को, निर्दोष बताते हुए क्लोजर रिपोर्ट पेश कर दी थी।
सीबीआई ने सिर्फ भोपाल पुलिस की इन्वेस्टीगेशन को खारिज किया, हथियारों को नहीं ढूंढा
भारत में जब लोगों को लगता है कि, किसी मामले की जांच करने के लिए स्थानीय पुलिस सक्षम नहीं है तब सीबीआई जांच की मांग की जाती है। 2019 में भी ऐसा ही हुआ था। मनुआभान टेकरी दुष्कर्म एवं हत्या कांड में भोपाल पुलिस की इन्वेस्टीगेशन से असंतुष्ट होकर लोगों ने सीबीआई जांच की मांग की थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस मामले के लिए मध्य प्रदेश पुलिस को अयोग्य मानते हुए जनता की मांग पर सीबीआई जांच के आदेश दे दिए थे। सीबीआई ने जांच के बाद बताया कि भोपाल पुलिस ने जो जांच की है वह गलत है और मामले में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। मतलब अपराध हुआ, कक्षा 8 की मासूम छात्रा के साथ दुष्कर्म हुआ और उसकी हत्या भी की गई लेकिन सीबीआई की रिपोर्ट में बताया गया कि, भोपाल पुलिस की इन्वेस्टीगेशन गलत है। सीबीआई ने यह नहीं बताया कि यदि भोपाल पुलिस की इन्वेस्टीगेशन गलत है तो सही क्या है। अपराधी कौन है। बल्कि सीबीआई ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी थी। इसका मतलब हुआ कि अपराधी कौन है? इसका पता सीबीआई भी नहीं लगा पाई है और अब भारत में कोई नहीं लग पाएगा। इसलिए मामले को बंद कर दिया जाए।
भोपाल कोर्ट का लैंडमार्क जजमेंट
भोपाल की विशेष न्यायाधीश कुमुदिनी पटेल ने इस मामले में सभी पक्षों को ध्यानपूर्वक सुना। सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया और भोपाल पुलिस की इन्वेस्टीगेशन (CCTV, गवाहों और अन्य सबूतों के आधार पर) न्यायालय में सही पाई गई। इसके आधार पर न्यायाधीश ने मामले के दोनों आरोपी अविनाश साहू और जस्टिन राज को अपराधी घोषित करते हुए, जीवन की अंतिम सांस तक जेल में बंद रखने का आदेश दिया। इस मामले में यह उदाहरण भी स्थापित हो जाएगी यदि डीएनए रिपोर्ट की स्थिति संदिग्ध हो जाती है तब भी न्यायालय, अंतिम निष्कर्ष और निर्णय तक पहुंच सकता है।
मनुआभान टेकरी कांड क्या है
दिनांक 30 अप्रैल 2019 को 16 साल की लड़की अपने दोस्त अविनाश साहू के साथ मनुआभान घूमने गई थी। वह अपने साथ कक्षा 8 में पढ़ने वाली भतीजी को भी ले गई थी। भोपाल पुलिस की इन्वेस्टीगेशन के अनुसार आरोपियों ने टेकरी पर बालिका के साथ दुष्कर्म करने के बाद पत्थर से सिर कुचलकर उसकी हत्या कर दी थी और शव को करीब 100 फीट गहरी खाई में स्थित गुफा में छिपा दिया था। सिचुएशन इसलिए पैनिक हो गई थी क्योंकि, मनुआभान टेकरी भोपाल का एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है और यहां से कक्षा 8 में पढ़ने वाली लड़की अचानक गायब हो गई थी। लोकल के लोग और कोहेफिजा थाने की पुलिस रात भर लड़की को ढूंढते रहे लेकिन लड़की नहीं मिली।
अविनाश साहू भी पुलिस के साथ लड़की को ढूंढने का अभिनय करता रहा। क्योंकि घटना के समय वह दोनों लड़कियों के साथ था, इसलिए पुलिस ने उससे कई राउंड पूछताछ की और पुलिस के सवालों में अविनाश साहू का सच सामने आ गया। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार अविनाश साहू द्वारा ही घटना स्थल की जानकारी दी। वह पुलिस टीम को 100 फीट गहरी खाई के अंदर स्थित एक गुफा में ले गया। यहीं पर लड़की की डेड बॉडी पड़ी हुई थी। पुलिस ने पॉक्सो एक्ट और हत्या सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर डीएनए रिपोर्ट, मेडिकल साक्ष्य और गवाहों के आधार पर चालान पेश किया था। इसमें अविनाश साहू और जस्टिन राज ने किस प्रकार से वारदात को अंजाम दिया, पूरी कहानी विस्तार से बताई गई थी। सभी संबंधित पक्षों के बयान भी थे, और यही इन्वेस्टिगेशन न्यायालय में निर्णय का आधार बनी।
मनुआभान टेकरी कांड की जांच सीबीआई को क्यों दी गई थी?
दरअसल, सागर फॉरेंसिक लैब से आई रिपोर्ट में बताया गया था कि, दोनों आरोपियों के ब्लड/सीमन सैंपल का पीड़िता (12 वर्षीय बालिका) के शरीर से मिले सैंपल से मिलान नहीं हुआ है। मतलब रिपोर्ट नेगेटिव है और दोनों आरोपियों ने बलात्कार नहीं किया था। मामला सुर्खियों में था और पुलिस के ऊपर आरोप लगे कि उन्होंने निर्दोष युवकों को पकड़कर असली अपराधी को बचाने का प्रयास किया है। प्रेशर में आई पुलिस ने सागर फॉरेंसिक लैब की विश्वसनीयता पर सवाल उठा दिए। जबकि सागर फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट के आधार पर 29 मामलों में मौत की सजा सुनाई जा चुकी थी। पुलिस ने डीएनए जांच के लिए सैंपल हैदराबाद भेजे लेकिन रिपोर्ट नहीं आई। फिर दिल्ली की लैब में भेजे गए। कुल मिलाकर डीएनए रिपोर्ट के मामले में पैदा हुए अविश्वास की स्थिति को भोपाल पुलिस हैंडल नहीं कर पाई। पीड़िता के पिता और परिवार ने पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं किया। इसके बाद मामला सीबीआई को दे दिया गया। सीबीआई ने मोबाइल टावर डेटा के आधार पर 60+ लोगों के डीएनए सैंपल लिए और अंत में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी।

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