भोपाल, 13 जून 2026: मध्य प्रदेश के अस्पतालों में चिकित्सा में लापरवाही के कारण हर रोज दर्जनों लोगों की मौत हो जाती है, आवाज भी उठाई जाती है लेकिन कार्रवाई नहीं होती। इस मामले में 6 महीने के संघर्ष के बाद कार्रवाई हुई है। मामला दर्ज किया गया है और रिपोर्ट में लिखा गया है कि, इलाज करवाने के लिए सागर से आए कैंसर पीड़ित बच्चे को जहरीले केमिकल से युक्त वह इंजेक्शन लगा दिया गया जो लाशों को सड़ने से बचाने के लिए लगाया जाता है। यह केवल आरोप नहीं है, AIIMS Bhopal की आधिकारिक जांच में यह बात प्रमाणित हुई है। इसके बाद ही मामला दर्ज किया गया।
स्टाफ नर्स ने फॉर्मेलिन से भरी सिरिंज मरीज के पास छोड़ दी
पुलिस के अनुसार, सागर जिले के बीना क्षेत्र के कोरजा गांव निवासी तीन वर्षीय सार्थक यादव को 15 दिसंबर 2025 को बुखार की शिकायत के बाद एम्स भोपाल के पीडियाट्रिक वार्ड-दो में भर्ती कराया गया था। वह बी-एएलएल (बी-सेल एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया) बीमारी से पीड़ित था, जो एक तरह का कैंसर है। 16 दिसंबर को बच्चे की बोन मैरो एस्पिरेशन और बायोप्सी होनी थी। इसके लिए जरूरी फॉर्मेलिन अस्पताल में उपलब्ध नहीं था। नर्सिंग अधिकारी अनुका गुजराती बाजार से फॉर्मेलिन से भरी 10 एमएल की सिरिंज लेकर आईं। इस बीच बायोप्सी की प्रक्रिया टाल दी गई, लेकिन नर्सिंग अधिकारी ने उस सिरिंज को नष्ट करने या सुरक्षित रखने के बजाय मरीज के बेड के पास मेज पर ही छोड़ दिया।
पिता ने रोका लेकिन नर्स नहीं मानी, इंजेक्शन लगा दिया
अगले दिन 17 दिसंबर की सुबह करीब 7:15 बजे सार्थक की आईवी लाइन चोक हो गई। इस दौरान ड्यूटी पर मौजूद नर्सिंग अधिकारी मधुबाला शर्मा ने बिना लेबल और सामग्री की जांच किए मेज पर रखी वही सिरिंज उठा ली, जिसमें फॉर्मेलिन भरी हुई थी। आरोप है कि बच्चे के पिता सिद्धार्थ यादव ने उन्हें कई बार चेतावनी दी कि सिरिंज में दवा नहीं कुछ और है, फिर भी उन्होंने उसे बच्चे की नस में इंजेक्ट कर दिया।
इंजेक्शन लगते ही बच्चे की मौत हो गई
इंजेक्शन लगते ही बच्चा अचेत हो गया और कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट, गवाहों के बयान और एम्स की आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट में मौत का सीधा संबंध फॉर्मेलिन इंजेक्शन से पाया गया।
क्या होता है फॉर्मेलिन?
बता दें कि फॉर्मेलिन एक रासायनिक घोल है, जिसमें सामान्य तौर पर 37–40 प्रतिशत फॉर्मल्डिहाइड गैस पानी में घुली होती है। इसमें थोड़ी मात्रा में मेथेनॉल भी मिलाया जाता है ताकि यह स्थिर रहे। इसका उपयोग मुख्य रूप से जैविक नमूनों और लाशों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इसके कारण डेड बॉडी सड़ती नहीं है। मतलब यह दवाई इतनी जहरीली है कि कीड़े पैदा भी नहीं हो पाते। अगर यह रक्त में पहुंच जाए, तो पूरी तरह जानलेवा है।
पुलिस ने नर्सिंग अधिकारी मधुबाला शर्मा पर जानलेवा लापरवाही और दूसरी स्टाफ नर्स अनुका के खिलाफ खतरनाक रसायन को असुरक्षित तरीके से रखने का मामला दर्ज किया गया है।

