सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कानून बना तो भारत में महिलाओं का करियर खत्म हो जाएगा

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 13 मार्च 2026
: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में महिलाओं से जुड़ी हुई एक याचिका को खारिज करते हुए, CJI सूर्यकांत ने कहा कि ऐसी याचिकाएं अनजाने में महिलाओं के बारे में बनी रूढ़ियों को और मजबूत कर सकती हैं। यह कानून बनाया तो महिलाओं को कोई काम नहीं देगा, उनका करियर खत्म हो जाएगा। यह मामला एक सबक देकर जाता है। नागरिकों को सरकारी सुविधाओं की एक लिमिट होनी चाहिए, कहीं ऐसा ना हो, सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधा, लाइफ में कई समस्याओं का कारण बन जाए। 

‘Women’s Careers May End’: Supreme Court of India Warns Against Proposed Law

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। जिसमें मांग की गई थी कि, कामकाजी महिलाओं और स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाली महिलाओं को पीरियड्स के समय पेड लीव दी जानी चाहिए। CJI सूर्यकांत ने कहा कि ऐसी याचिकाएं अनजाने में महिलाओं के बारे में बनी रूढ़ियों को और मजबूत कर सकती हैं। यह कानून बनाया तो महिलाओं को कोई काम नहीं देगा, उनका करियर खत्म हो जाएगा। CJI ने कहा, ये याचिकाएं डर पैदा करने के लिए, महिलाओं को हीन दिखाने के लिए, यह जताने के लिए दायर की जाती हैं कि पीरियड्स उनके साथ होने वाली कोई बुरी चीज है। यह उनका पॉजिटिव राइट है, लेकिन उस नियोक्ता के बारे में सोचिए, जिसे पेड लीव देनी होगी।

CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान मेंस्ट्रुअल लीव को अनिवार्य बनाने के संभावित सामाजिक परिणामों के बारे में चिंता जाहिर की। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस मामले को लेकर खुद कोई महिला कोर्ट में नहीं आई है।

पेड मेंस्ट्रुअल लीव पर CJI के कमेंट्स

मान लीजिए आप पूरे प्राइवेट सेक्टर को महीने में एक बार छुट्टी लेने का अधिकार देते हैं तो यह उनके विकास के लिए नुकसानदायक हो सकता है। आपको वर्क प्लेस पर बनने वाली मानसिकता का अंदाजा नहीं है।
इस पर कानून बना तो महिलाओं के करियर को होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाएगा। कोई भी उन्हें जिम्मेदारियां नहीं देगा, यहां तक ​​कि ज्यूडीशियल सर्विस में भी, उन्हें सामान्य मुकदमे नहीं सौंपे जाएंगे।

हम निर्देश देते हैं कि सक्षम प्राधिकारी सुप्रीम कोर्ट के 24 फरवरी 2023 और 8 जुलाई 2024 के आदेशों के जरिए दिए गए निर्देशों पर विचार करे और एक नीति तैयार करे।

मेंस्ट्रुअल लीव का मुद्दा तीसरी बार कोर्ट लेकर पहुंचा याचिकाकर्ता

पेड मेंस्ट्रुअल लीव की याचिका लेकर शैलेंद्र मणि तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। पहली याचिका का निपटारा फरवरी 2023 में किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता को केंद्रीय महिला एवं बाल मंत्रालय के समक्ष अपना पक्ष रखने की अनुमति दी गई थी।

2024 में याचिकाकर्ता ने फिर कोर्ट में याचिका लगाई और कहा कि मंत्रालय ने उनके पक्ष में दिए गए जवाब पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उस याचिका का निपटारा जुलाई 2024 में किया गया था, जिसमें केंद्र सरकार से नीतिगत निर्णय लेने को कहा गया था।

नई याचिका की मांगें…

भारत सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ऐसे कानून/नीतियां/सरकारी आदेश लाने का निर्देश देना जो मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को होने वाली पीड़ा (डिसमेनोरिया, एंडोमेट्रियोसिस, गर्भाशय फाइब्रॉइड, एडिनोमायोसिस, पेल्विक इन्फ्लेमेटरी डिजीज) से संबंधित समस्याओं को मान्यता देते हों और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अनुरूप छुट्टी देने समेत सभी जरूरी राहतें देते हों।

संविधान के अनुच्छेद 32 के साथ अनुच्छेद 14, 21 और अनुच्छेद 141 और 142 के तहत शक्ति का प्रयोग करते हुए कामकाजी महिलाओं और महिला छात्रों को अवकाश के रूप में राहत प्रदान करने के संबंध में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए निर्देश जारी करें।

देश के 4 राज्यों में मेंस्ट्रुअल लीव पर बने नियम

बिहार: 1992 में राज्य सरकार की और से यह नियम बनाया गया था जिसकी तहत महिला कर्मचारियों को हर महीने 2 दिन की पीरियड लीव मिलती है। इसे अक्सर स्पेशल केजुअल लीव कहा जाता है।
केरल: 2023 में केरल सरकार ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्राओं के लिए मेंस्ट्रुअल लीव की अनुमति दी। कुछ संस्थानों में मासिक धर्म के कारण उपस्थिति में छूट भी दी जाती है।
ओडिशा: 2024 में महिलाओं को पीरियड के पहले या दूसरे दिन 1 दिन की छुट्टी लेने का विकल्प दिया गया। यह सुविधा सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ कई निजी संस्थानों में भी लागू की गई।
कर्नाटक: 2025 में महिलाओं को हर महीने 1 दिन की पेड मेंस्ट्रुअल लीव (साल में 12 दिन) मिल सकती है। यह नियम सरकारी और कई निजी सेक्टर कर्मचारियों पर भी लागू किया गया।
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