नई दिल्ली, 21 जनवरी 2026: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आज एक बार फिर अपने लैंडमार्क जजमेंट को दोहराते हुए कहा कि, सरकारी कर्मचारी कोई भी हो, वह केंद्रीय कर्मचारी हो या राज्य का कर्मचारी हो, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कोई भी एजेंसी उसके खिलाफ जांच कर सकती है और मामला दर्ज कर सकती है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सोमवार को कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों की जांच राज्य एजेंसी या केंद्रीय एजेंसी या किसी भी पुलिस एजेंसी द्वारा की जा सकती है, जैसा कि अधिनियम की धारा 17 से देखा जा सकता है, इस शर्त के साथ कि पुलिस अधिकारी एक विशेष रैंक का होना चाहिए।
जांच के लिए सीबीआई की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं
धारा 17 राज्य पुलिस या राज्य की किसी विशेष एजेंसी को केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और कदाचार से संबंधित मामलों को दर्ज करने या जांच करने से नहीं रोकती है। पीठ ने कहा, 'सुविधा के लिए और काम के दोहराव से बचने के लिए सीबीआइ को केंद्र सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का कार्य सौंपा गया है। साथ ही, भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो (एसीबी) को राज्य सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का कार्य सौंपा गया है।' यह दोनों एजेंटीयों में वितरित की गई ड्यूटी है। उनके क्षेत्राधिकार नहीं है। इसलिए केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में जांच करने के लिए सीबीआई की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय हैं
पीठ ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध भी संज्ञेय हैं और इसलिए राज्य पुलिस द्वारा इनकी जांच की जा सकती है।
राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला बरकरार
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखते हुए आया है जिसमें केंद्र सरकार के एक कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि भले ही आरोपित केंद्रीय सरकारी कर्मचारी था, फिर भी राजस्थान एसीबी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रविधानों के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने का अधिकार था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया है कि यह कहना गलत है कि केवल सीबीआई ही अभियोजन शुरू कर सकती थी।'
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