प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि स्वायत्त संस्थाओं के कर्मचारी सरकारी कर्मचारियों की तरह पेंशन लाभों का स्वतंत्र दावा नहीं कर सकते। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज के शिक्षकों और कर्मचारियों की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि संस्थान का इलाहाबाद विश्वविद्यालय का "कॉन्स्टिट्यूएंट इंस्टीट्यूट" बनना ही पर्याप्त नहीं है। इससे GPF-cum-Pension Scheme का अधिकार अपने आप हासिल नहीं हो जाता।
GPF-cum-Pension के लिए कर्मचारियों की जनहित याचिका खारिज
यह फैसला प्रोफेसर डॉ. एस.के. पंत और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर PIL पर आया है, जिसमें उन्होंने केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तर्ज पर पेंशन स्कीम लागू करने की मांग की थी। जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की सिंगल बेंच ने सुनवाई के बाद याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि पंत संस्थान एक स्वायत्त इकाई बना हुआ है, जिसका फंडिंग केंद्र और राज्य सरकार संयुक्त रूप से करती हैं। लेकिन CCS (Pension) Rules या कोई ऐसा प्रावधान स्वतः लागू नहीं होता, जो कर्मचारियों को यह लाभ दे सके। "केवल कॉन्स्टिट्यूएंट स्टेटस पेंशन का आधार नहीं बन सकता, जब तक सक्षम अथॉरिटी स्पष्ट निर्देश न दे," कोर्ट ने टिप्पणी की।
फैसले में कोर्ट ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड कर्मचारियों के समान केस का जिक्र किया, जहां इस हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और डिवीजन बेंच ने दावे को खारिज कर दिया था। वर्तमान मामले में भी परिस्थितियां एक जैसी होने से कोई राहत संभव नहीं। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि ऑटोनॉमस बॉडीज के एम्प्लॉयी, भले ही उन्हें गवर्नमेंट से फुल या पार्शियल फंडिंग मिले, गवर्नमेंट सर्वेंट्स की तरह पेंशन क्लेम नहीं कर सकते। "सर्विस कंडीशंस इंस्टीट्यूशन के अपने रूल्स से तय होती हैं, इसलिए इक्वालिटी का दावा जस्टिफाय नहीं होता," कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला।
यह फैसला स्वायत्त संस्थाओं के कर्मचारियों के लिए एक संकेतक हो सकता है, जहां फंडिंग और एफिलिएशन के बावजूद पेंशन जैसे लाभों के लिए स्पष्ट पॉलिसी की जरूरत पर जोर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं को अब सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प खुला है, लेकिन कोर्ट की यह टिप्पणी संस्थागत स्वायत्तता और सरकारी नियमों की सीमाओं को रेखांकित करती है।
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