G20 लीडर्स समिट में भारत की कूटनीतिक जीत, बाइलेटरल आउटरीच भी प्रभावशाली रही

सेंट्रल न्यूज़ रूम, 25 नवंबर 2025
: साउथ अफ्रीका में सम्पन्न हुआ G20 लीडर्स समिट कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। पहली बार ऐसा हुआ कि समिट के पहले ही दिन बिना किसी आपत्ति के लीडर्स डिक्लेरेशन सर्वसम्मति से अपनाया गया, वो भी तब जब अमेरिका की उपस्थिति नहीं थी। फिर भी अफ्रीका और ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को जिस मजबूती से जगह मिली, उसे भारत की कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।

दुनिया आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ती असमानता और टूटी हुई ग्लोबल इकॉनमी के बीच सहयोग ही एकमात्र रास्ता है, यह बात नेताओं ने साफ-साफ कही। डिक्लेरेशन में कर्ज़ सुधार को केंद्र में रखा गया और जलवायु फाइनेंस को बिलियन्स से ट्रिलियन्स डॉलर तक ले जाने की जरूरत पर फिर जोर दिया गया।

भारत के लिए G20 लीडर्स समिट खास क्यों

भारत के लिए यह समिट खास इसलिए रहा क्योंकि क्लीन एनर्जी, जस्ट एनर्जी ट्रांजिशन, क्रिटिकल मिनरल्स और फूड सिक्योरिटी जैसे मुद्दे, जिन पर भारत ने अपनी G20 प्रेसिडेंसी में सबसे ज्यादा जोर दिया था, उन्हें इस बार भी मजबूत पुष्टि मिली। डिक्लेरेशन में स्पष्ट लिखा गया कि ऊर्जा सुरक्षा, किफायती कीमत, पहुंच और स्थिरता, ये चारों एक साथ चलेंगे। साथ ही 2030 तक रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को तीन गुना और एनर्जी एफिशिएंसी को दोगुना करने का वादा फिर दोहराया गया, यही दो लक्ष्य भारत पिछले कई वर्षों से सबसे मुखर तरीके से उठाता आया है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने क्रिटिकल मिनरल्स पर सेशन में भारत का विज़न रखते हुए कहा कि रीसायकलिंग, अर्बन माइनिंग और सेकंड लाइफ बैटरी जैसे कदम आने वाले दशक का आधार बनेंगे। फूड सिक्योरिटी पर भी भारत ने डेकिन प्रिंसिपल्स को फिर याद दिलाया और जलवायु संकट को सीधे भोजन सुरक्षा से जोड़ा।

ग्लोबल साउथ की आवाज़ इस बार सचमुच गूंजी। अफ्रीकी नेताओं की ALDRI पहल को डिक्लेरेशन में सराहा गया। उनका कहना था कि विकासशील देश कर्ज़ के बोझ तले दबे हैं और अगर ढांचा नहीं बदला गया तो स्वास्थ्य, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश ही नहीं कर पाएंगे। भारत ने इस बात को और बल दिया कि अब विकास की परिभाषा बदलनी होगी, जो प्रकृति के दोहन पर नहीं, संतुलन पर आधारित हो।

विशेषज्ञों का भी यही मानना है। पूर्व राजदूत डॉ. मोहन कुमार ने कहा कि अमेरिका के न होने से G20 कमजोर नहीं हुआ, बल्कि यह साबित हुआ कि दुनिया का बड़ा हिस्सा अभी भी बहुपक्षवाद में यकीन रखता है और भारत ने ग्लोबल साउथ की आवाज़ को स्पष्ट जगह दिलाई। वहीं CSE की तृषांत देव ने कहा कि ग्रीन इंडस्ट्रियलाइजेशन को भविष्य का रास्ता मानना और क्रिटिकल मिनरल्स पर नया फ्रेमवर्क विकासशील देशों के लिए बड़ा कदम है, हालांकि जलवायु और व्यापार के बदलते समीकरण नई चुनौती भी ला रहे हैं।

समिट के इतर भारत की बाइलेटरल आउटरीच भी प्रभावशाली रही। इटली के साथ आतंकवाद की फंडिंग रोकने का नया इनिशिएटिव, कनाडा के साथ व्यापार वार्ता की फिर शुरुआत, और मेजबान साउथ अफ्रीका के साथ मिनरल सहयोग एवं ग्लोबल साउथ की आवाज़ को और मजबूत करने पर सहमति बनी।

कुल मिलाकर दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता वाला यह G20 बताता है कि दुनिया अब नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहाँ ग्लोबल साउथ की आवाज़ सिर्फ सुनी नहीं जा रही, बल्कि फैसलों की दिशा तय कर रही है। भारत ने इस आवाज़ को और स्पष्ट, और मजबूत बनाया है।

अतिरिक्त जानकारी और संदर्भ

- यह पहला G20 लीडर्स समिट था जिसमें अफ्रीकी संघ (African Union) को स्थायी सदस्यता मिलने के ठीक बाद पूर्ण सदस्य के तौर पर हिस्सा लिया।
- डिक्लेरेशन में “Loss and Damage Fund” को ऑपरेशनल बनाने की प्रतिबद्धता फिर दोहराई गई, जिसकी पहली फंडिंग कॉन्फ्रेंस COP30 से पहले होगी।
- भारत-ब्राजील-साउथ अफ्रीका (IBSA) की तिकड़ी ने मिलकर ग्लोबल साउथ के कर्ज़ पुनर्गठन पर एक संयुक्त प्रस्ताव आगे बढ़ाया, जो आने वाले वर्षों में G20 एजेंडा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
- क्रिटिकल मिनरल्स पर बने नए फ्रेमवर्क में भारत की प्रस्तावित “Mission Circular Economy” को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन मिला है, जिससे रीसाइक्लिंग और सेकंडरी सोर्सिंग में भारत की भूमिका बढ़ेगी।

यह समिट भारत के लिए सिर्फ कूटनीतिक सफलता नहीं, बल्कि अपने विकास मॉडल को विश्व मंच पर स्थापित करने का एक और मजबूत कदम साबित हुआ है। रिपोर्ट: निशांत सक्सेना, एडिटिंग: उपदेश अवस्थी
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