BIG NEWS! शैम्पू, बॉडी वॉश, लिक्विड डिटर्जेंट या पॉलिमर सॉल्यूशन यूज करने वालों के लिए

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एक बहुत ही इंटरेस्टिंग और यूज़फुल रिसर्च की खबर लेकर आए हैं आपके लिए। भारत के वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसा ढूंढ निकाला है जो सीधे-सीधे तेल इंडस्ट्री और ब्यूटी-कॉस्मेटिक्स सेक्टर को प्रभावित करता है। अब आप आसानी से बता सकते हैं कि कौन सा शैम्पू, बॉडी वॉश, लिक्विड डिटर्जेंट या पॉलिमर सॉल्यूशन अच्छा है और कौन सा खराब। कंपनी नहीं क्वालिटी चेक करना सीख जाएंगे। 

वह क्रिया जो रिसर्च का कारण बनी 

दरअसल, शैम्पू, बॉडी वॉश, लिक्विड डिटर्जेंट या फिर पॉलिमर सॉल्यूशन जैसे गाढ़े-चिपचिपे फ्लुइड्स में जब कोई छोटी चीज़ (जैसे कोई प्रोब या गेंद) घूमती है तो उसकी मूवमेंट बिल्कुल अनप्रेडिक्टेबल और कैओटिक हो जाती है। पानी या सरसों के तेल जैसे नॉर्मल न्यूटोनियन फ्लुइड्स में तो ऑब्जेक्ट जल्दी ही एक स्टेडी टर्मिनल वेलोसिटी पकड़ लेता है, लेकिन इन वर्मलाइक माइसेलर फ्लुइड्स (WMF) में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। यहाँ स्ट्रक्चर बार-बार बनते और टूटते हैं, जिससे मोशन पूरी तरह अराजक हो जाता है।

रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट की उपलब्धि

अब तक इसे समझना बहुत मुश्किल था, लेकिन बेंगलुरु के रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI) के रिसर्चर्स ने DST के सपोर्ट से एक कस्टम-मेड एक्सपेरिमेंटल सेटअप तैयार किया है। इसमें दो कंसेंट्रिक सिलेंडर्स के बीच फ्लुइड भरा जाता है और एक पतली नीडल जैसी प्रोब कंट्रोल्ड स्पीड से उसमें से गुज़रती है। साथ ही हाई-स्पीड ऑप्टिकल इमेजिंग से लोकल स्ट्रक्चर्स और वेलोसिटी फील्ड को रियल-टाइम देखा जा सकता है।

रिसर्च का रिज़ल्ट 

रिज़ल्ट चौंकाने वाला था – कम स्पीड पर तो बिहेवियर बिल्कुल न्यूटोनियन फ्लुइड्स जैसा रहता है, यानी ड्रैग फोर्स स्टेबल। लेकिन जैसे ही स्पीड एक क्रिटिकल वैल्यू क्रॉस करती है, फोर्स एक रिदमिक सॉ-टूथ (saw-tooth) पैटर्न दिखाने लगता है – धीरे-धीरे बढ़ता है, फिर अचानक ड्रॉप। इसका कारण? प्रोब के पीछे एक “वेक” नाम की टेल जैसी स्ट्रक्चर बनती है जो इलास्टिक रबर बैंड की तरह स्ट्रेच होती है और फिर अचानक टूटकर अलग हो जाती है।

लीड ऑथर और RRI के PhD स्कॉलर अभिषेक घड़ाई कहते हैं, “यह कस्टम सेटअप हमें जटिल मैटेरियल्स के माइक्रो-लेवल बिहेवियर को बहुत डिटेल में समझने की अनोखी फ्रीडम देता है।” वहीं प्रोफेसर सायंतन मजूमदार (जिन्होंने प्रोजेक्ट लीड किया) बताते हैं कि अलग-अलग लेंथ स्केल्स पर मैकेनिक्स को समझना फंडामेंटल साइंस के साथ-साथ प्रैक्टिकल एप्लीकेशंस के लिए भी ज़रूरी है।

यह पूरा काम हाल ही में जर्नल ऑफ रियोलॉजी (J. Rheol.) में पब्लिश हुआ है। रिसर्चर्स का मानना है कि अलग-अलग शेप-साइज़ की प्रोब्स और अलग-अलग सिस्टम्स के साथ आगे एक्सपेरिमेंट्स से साइंस और टेक्नोलॉजी में कई नए दरवाज़े खुल सकते हैं।

तो दोस्तों, अगली बार जब आप शैम्पू की बॉटल खोलें तो याद रखिए – उसकी स्मूद फील के पीछे कितना कॉम्प्लेक्स साइंस छुपा है, और हमारे भारतीय वैज्ञानिक उसे डीकोड कर रहे हैं। Proud moment indeed! 🙏

इसका फायदा क्या होगा?

शैम्पू, क्रीम, फेसवॉश बनाने वाली कंपनियाँ अब बेहतर प्रोडक्ट्स बना सकेंगी – जो न ज्यादा पतले हों, न ज्यादा गाढ़े, बिल्कुल परफेक्ट फील देंगे।
तेल कंपनियाँ (जो जमीन से तेल निकालती हैं) इन लिक्विड को पाइप में बेहतर तरीके से भेज सकेंगी, कम बिजली लगेगी, कम रुकावट आएगी।
नई-नई क्रीम, लोशन, डिटर्जेंट ज्यादा स्मूद और इस्तेमाल करने में मज़ेदार बनेंगे।
आपको भी अच्छे बौर बुरे शैम्पू, क्रीम, फेसवॉश इत्यादि की तकनीकी जानकारी हो जाएगी। कोई ब्रांड आपको बना नहीं पाएगा। 

संक्षेप में: हमारे वैज्ञानिकों ने शैम्पू-क्रीम जैसे प्रोडक्ट्स के अंदर छुपे “गुस्से” को समझ लिया और अब उसे कंट्रोल करना आसान हो जाएगा। छोटी सी खोज, रोज़ की ज़िंदगी में बड़ा आराम देगी।  
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