आरक्षण के संबंध में बहुचर्चित पटना हाई कोर्ट के फैसले का सारांश पढ़िए - Hindi NEWS

पटना हाई कोर्ट के उस फैसले की देशभर में चर्चा हो रही है जिसमें माननीय उच्च न्यायालय ने बिहार सरकार के नए आरक्षण कानून को रद्द कर दिया। इसमें आरक्षण की सीमा 50% से बढ़कर 65% कर दी गई थी। 

आरक्षण की 50% सीमा भारत के संविधान द्वारा निर्धारित नहीं है

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के लिए लड़ रहे अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने बताया कि, पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि आरक्षण की 50% सीमा भारत के संविधान द्वारा निर्धारित नहीं है। बिहार सरकार के आरक्षण कानून को हाई कोर्ट द्वारा इसलिए रद्द नहीं किया गया है क्योंकि उसमें आरक्षण की सीमा बढ़ा दी गई थी बल्कि इसलिए रद्द कर दिया गया क्योंकि बिहार सरकार के पास ऐसी कोई आंकड़े नहीं थे जो यह प्रमाणित करते हो कि राज्य में आरक्षण की सीमा को बढ़ा देना जनहित में अनिवार्य है। 

जनसंख्या के आधार पर आरक्षण का निर्धारण नहीं कर सकते

श्री ठाकुर ने बताया कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि बिहार सरकार ने जनगणना के आधार पर आरक्षण बढ़ा दिया है। इसलिए बिहार सरकार का आरक्षण कानून भारत के संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के विरुद्ध माना गया। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कई फसलों में यह स्पष्ट किया है कि पिछड़े समुदाय के लिए आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने के लिए जनगणना के आंकड़ों को आधार नहीं माना जा सकता है। सरकार के पास इसके लिए ठोस कारण होनी चाहिए जो इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ 1992 पूरक (3) पृष्ठ 217 के अनुसार गठित किए गए स्वतंत्र आयोग द्वारा एकत्रित किए गए हो। 

50% आरक्षण की सीमा को बढ़ाने की अनुमति कौन दे सकता है

श्री ठाकुर ने बताया कि माननीय बिहार उच्च न्यायालय के फैसले के पैराग्राफ नंबर 810 में कहा गया है कि, असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए 50% आरक्षण की सीमा को बढ़ाया जा सकता है लेकिन यह अधिकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय के पास सुरक्षित है और सर्वोच्च न्यायालय ही इसकी समीक्षा कर सकता है। 

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