आलोचना और आरोप में क्या अंतर है, दोनों में क्या महत्वपूर्ण है, पीएम नरेंद्र मोदी ने बताया- GK Today

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ज्यादातर लोग आलोचना और आरोप को एक जैसा ही मानते हैं। कई लोगों को शब्दों से समझ में आता है कि आलोचना और आरोप अलग-अलग हैं परंतु उन्हें यह नहीं पता होता कि किस प्रकार के वाक्यों को आलोचना कहा जाता है और किस सेंटेंस को आरोप माना जाना चाहिए। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस अंतर को बड़े ही सरल शब्दों में समझाया है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, आलोचना और आरोप में बड़ी खाई है

परीक्षा पर चर्चा दिनांक 27 जनवरी 2030 को पीएम मोदी ने स्टूडेंट्स को लाइफ से जुड़े कई हैक्स और टिप्स दिए। उन्होंने डिजिटल फास्टिंग की अपील की यानी टेक्नोलॉजी की दुनिया में सप्ताह में सिर्फ एक दिन इंटरनेट से डिस्कनेक्ट हो जाइए और जो भी करना है ऑफलाइन कीजिए। सफलता के मंत्र समझाते हुए उन्होंने आलोचना और आरोप में अंतर और महत्व दोनों को बड़ी ही सरलता के साथ समझाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि आलोचना और आरोप में बड़ी खाई है। आलोचना के लिए बहुत मेंहनत और प्रयास लगते है। इसलिए उनको कभी हलके में नहीं लें। आरोप शार्टकट है, इस से प्रभावित नहीं होना चाहिए। 

आलोचना क्या होती है 

आलोचना या समालोचना को अंग्रेजी में Criticism और संस्कृत में टीका-व्याख्या कहा जाता है। अंग्रेजी के क्रिटिसिजम से आलोचना को समझ पाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है परंतु संस्कृत के टीका-व्याख्या से इसे ठीक प्रकार से समझा जा सकता है। स्पष्ट होता है कि यह किसी भी विषय अथवा वस्तु की निंदा (Condemnation) नहीं है बल्कि उसकी समीक्षा है। प्रशंसा और निंदा आलोचना के दो भाग हो सकते हैं परंतु आलोचना इन दोनों से अधिक है। आलोचना के लिए आलोचक को विषय का अध्ययन करना होता है और वस्तु का उपयोग करके देखना पड़ता है। आलोचक का अनुभवी एवं ज्ञानी होना भी अनिवार्य है। आजकल ऑनलाइन रिव्यू रेटिंग, आलोचना/ समालोचना का ही एक हिस्सा है।

आरोप क्या होता है

आरोप यानी Blame काफी सरल काम है क्योंकि इसके लिए किसी भी विशेषज्ञता और अनुभव की आवश्यकता नहीं है। आरोप कोई भी लगा सकता है। आरोपी कोई परिभाषा नहीं है। भारत के कानूनों की किताबों में इसे दोषारोपण कहा गया है। सीआरपीसी यानी दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 2(ख) में आरोप की परिभाषा के नाम पर सिर्फ इतना लिखा है, "आरोप के अन्तर्गत, जब आरोप में एक से अधिक शीर्ष हो, आरोप का कोई भी शीर्ष है।"। कुल मिलाकर जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर किसी प्रकार का दोषारोपण करता है तब उसे आरोप कहा जाता है। 

भारत के कानूनों के तहत आरोप अर्थात दोषारोपण को सिद्ध करना अनिवार्य है। जब तक उसे सिद्ध नहीं कर दिया जाता तब तक उसे विश्वसनीय नहीं माना जाता। यहां तक कि आरोपी व्यक्ति को निर्दोष और सामान्य नागरिक माना जाता है। आरोप के आधार पर आरोपी व्यक्ति के किसी भी अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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