MP NEWS- सरकारी स्कूलों के लिए DEO ने दवा कंपनी से टीवी-लैपटॉप खरीदे, DPI ने पकड़ा

भोपाल
। स्कूल शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश में अजीब किस्म की रेस चल रही है। विभागीय छानबीन के दौरान वित्तीय अनियमितताओं के मामले उजागर होते हैं। दोषी अधिकारियों को आरोप पत्र भी दिए जाते हैं परंतु फिर मामले ठंडे पड़ जाते हैं। सागर में दवाई बेचने वाली कंपनी से टीवी और लैपटॉप खरीदने के बिल लगा दिए। जांच में गड़बड़ी पकड़ी गई। आरोप पत्र भी जारी हुए लेकिन फिर फाइल ठंडे बस्ते में चली गई। 

सागर के स्कूलों में टीवी-लैपटॉप खरीदी घोटाला

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणा के अनुसार स्कूलों में स्मार्ट क्लास शुरू करनी है। इसके लिए 65 इंच स्मार्ट टीवी और लैपटॉप खरीदना था। जेम पोर्टल से खरीदारी करने के निर्देश थे। निर्देशों का पालन करते हुए जेम पोर्टल पर BID लगाई गई और एक कंपनी को ऑर्डर दे दिया गया। इसके बाद पेमेंट के लिए बिल लगा दिया गया। यहां उल्लेख करना अनिवार्य है कि पेमेंट के लिए बिल तब लगाया जाता है जब माल प्राप्त हो जाता है। सागर में बिल लगा दिए गए यानी माल प्राप्त हो गया था। 

टीवी-लैपटॉप खरीदी में गड़बड़ी कहां हुई

सरकारी स्कूलों के लिए जेम पोर्टल के माध्यम से टीवी और लैपटॉप की खरीदी में हर प्रक्रिया का पालन किया गया परंतु 1 गड़बड़ी हो गई। जिस कंपनी का आर्डर दिया गया, जिस कंपनी से माल प्राप्त हुआ और जिस कंपनी को पेमेंट के लिए बिल लगाए गए हैं। वह कंपनी टीवी और लैपटॉप नहीं बनाती। वह किसी भी टीवी और लैपटॉप बनाने वाली कंपनी की अधिकृत विक्रेता भी नहीं है। वह कंपनी तो दवाइयां बनाती है। दवा बनाने वाली कंपनी से टीवी और लैपटॉप खरीदना बता दिया गया। 

गड़बड़ी पकड़ी गई तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई

अब मूल मुद्दे की बात। जानकारी सामने आने पर सागर के संयुक्त संचालक डॉ मनीष वर्मा ने मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई। समिति ने गड़बड़ी का खुलासा कर दिया। तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी अजब सिंह ठाकुर और एपीसी सीबीएस राजपूत को दोषी बताया गया। लोक शिक्षण संचालनालय की ओर से दोनों को आरोप पत्र जारी किए गए लेकिन इसके बाद कार्रवाई नहीं की गई। इसके पीछे का मुख्य कारण यह है कि डीपीआई के अधिकारी चाहते थे कि जेम पोर्टल पर उस रजिस्टर्ड फर्म को आर्डर दिया जाए जिसे अधिकारियों ने चुना है। सागर में अलग से BID लगाने का अपराध किया गया। आरोप पत्र जारी किए जाने के बाद स्थिति संचालनालय के अधिकारियों के कंट्रोल में आ गई। इसलिए कोई कार्यवाही नहीं की गई। 

दरअसल यह सब कुछ, सरकारी खजाने की रक्षा और स्कूल शिक्षा विभाग में वित्तीय अनियमितता को रोकने के लिए नहीं था बल्कि अकेले-अकेले वित्तीय अनियमितता को रोकने के लिए था।