सरकारी हो या प्राइवेट सभी कर्मचारियों के लिए काम की बात, Gratuity के नियम एवं फार्मूला

सरकारी कर्मचारी, संविदा कर्मचारी, आउटसोर्स कर्मचारी, ठेकेदार के कर्मचारी, प्राइवेट कंपनी के कर्मचारी अथवा कोई भी कर्मचारी जिसे एक ही सेवा में 5 साल से अधिक हो गए हैं वह ग्रेच्‍युटी (Gratuity) पाने का अधिकारी हो जाता है। 

कारपोरेट कंपनियों में कर्मचारियों को लंबे समय तक सेवाएं देने के उपलक्ष में रिवर्ट के तौर पर ग्रेच्युटी दी जाती है। इसे दिए जाने का निर्धारण नियोक्ता कर सकता है परंतु इसकी न्यूनतम राशि का निर्धारण एक खास फार्मूले के तहत होता है। कंपनी चाहे तो निर्धारित न्यूनतम से अधिक ग्रेच्युटी दे सकती है, लेकिन किसी भी स्थिति में यह अमाउंट ₹2000000 से ज्यादा नहीं होना चाहिए। 

ग्रेच्‍युटी की रकम एंपलाई को तब मिलती है जब वह नौकरी छोड़ता है अथवा रिटायर हो जाता है। कुल मिलाकर के ग्रेच्युटी किसी भी कर्मचारी के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है और इसके बारे में सभी को जानकारी होनी चाहिए। 

भारत में कर्मचारियों की ग्रेच्‍युटी से जुड़े 7 नियम

  • ग्रेच्‍युटी की रकम तय करने का एक फॉर्मूला होता है। ये फॉर्मूला है - (अंतिम सैलरी) x (कंपनी में कितने साल काम किया) x (15/26)। 
  • अंतिम सैलरी से मतलब, आपकी पिछले 10 महीने की सैलरी के औसत से है। 
  • इस सैलरी में मूल वेतन, महंगाई भत्ता और कमीशन को शामिल किया जाता है। 
  • महीने में रविवार के 4 दिन वीक ऑफ होने के कारण 26 दिनों को गिना जाता है और 15 दिन के आधार पर ग्रेच्यु​टी का कैलकुलेशन होता है। 

अगर किसी निजी या सरकारी कंपनी में 10 या इससे ज्यादा लोग काम करते हैं तो उस कंपनी को सभी कर्मचारियों को ग्रेच्‍युटी का लाभ देना चाहिए। कंपनी के अलावा इस नियम के दायरे में दुकानें, खान, फैक्ट्री आती हैं लेकिन कोई भी कर्मचारी लगातार 5 वर्ष तक उस कंपनी में काम करने के बाद ही गेच्‍युटी का हकदार बनता है। 
 
अगर किसी कर्मचारी ने कंपनी में 4 साल 8 महीने तक काम किया है तो उसकी नौकरी पूरे 5 साल की मानी जाएगी और उसे 5 साल के हिसाब से ग्रेच्‍युटी का अमाउंट मिलेगा। अगर उसने 4 साल 8 महीने से कम समय की नौकरी की है तो उसकी नौकरी की अवधि को 4 साल गिना जाएगा और ऐसे में उसे ग्रेच्‍युटी नहीं मिलेगी। यानी 4 साल 8 महीने तक काम करने के बाद भी आप ग्रेच्‍युटी के हकदार हो जाते हैं। 

गेच्‍युटी की अवधि में कर्मचारी के नोटिस पीरियड को भी काउंट किया जाता है। मान लीजिए कि आपने किसी कंपनी में 4.6 साल नौकरी करने के बाद इस्‍तीफा दे दिया, लेकिन इस्‍तीफे के बाद दो महीने का नोटिस पीरियड सर्व किया। ऐसे में आपकी नौकरी की अवधि को 4 साल 8 महीने ही गिना जाएगा। और इसे 5 साल मानकर ग्रेच्‍युटी की रकम दी जाएगी। 

जब कंपनी या संस्थान Gratuity Act के तहत रजिस्टर्ड न हो तो कर्मचारी ग्रेच्‍युटी एक्‍ट के तहत नहीं आते हैं। ऐसे में ग्रेच्‍युटी देना या न देना, कंपनी की स्‍वेच्‍छा होती है लेकिन अगर कंपनी फिर भी किसी कर्मचारी को ग्रेच्‍युटी देना चाहती है तो उसका फॉर्मूला अलग होता है। ऐसे में Gratuity की रकम, हर साल के लिए आधे महीने की सैलरी के बराबर होगी लेकिन महीने भर काम करने के दिनों की संख्या 30 दिन मानी जाएगी, 26 नहीं। 

कोई भी कंपनी अपने कर्मचारी को अधिकतम 20 लाख रुपए तक ही ग्रेच्‍युटी के तौर पर दे सकती है। ग्रेच्‍युटी के रूप में मिलने वाली रकम टैक्‍स फ्री होती है। ये नियम सरकारी नौकरी और प्राइवेट नौकरी, दोनों पर लागू होता है। 

नौकरी के दौरान अगर किसी कर्मचारी की मौत हो जाती है तो उसके ग्रेच्युटी खाते में जमा पूरी रकम उसके नॉमनी (Gratuity nominee) को दे दी जाती है। ऐसे मामले में कम से कम 5 साल नौकरी की शर्त लागू नहीं होती है।