मध्यप्रदेश में कपड़ों से आग नहीं लगती भाई, कुछ ढंग का काम करो- Editorial

पिछले कुछ दिनों से कुछ अशांति प्रिय लोग मध्यप्रदेश में कपड़ों से आग लगाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ लोगों ने बातों से चिंगारी पैदा करने की कोशिश की तो कुछ लोग सड़कों पर उतर कर उस चिंगारी से आग भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। उन नादानों को एक बार फिर से यह समझाने की जरूरत है कि मध्यप्रदेश में कपड़ों से आग नहीं लगती। यहां की पब्लिक का माइंड सेट कुछ और है। 

जब-जब पड़ोसी राज्यों में चुनाव होते हैं, मध्य प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति को ध्वस्त करने की कोशिश शुरू हो जाती है। लोग भूल जाते हैं कि मध्य प्रदेश में 70 नहीं 770 सालों का इतिहास है। बेतुकी बातों पर भीड़ तो जमा हो सकती है लेकिन वोट नहीं मिलते। यदि जनता इस तरह की दूषित हवाओं से प्रभावित होने वाली होती तो भोपाल जैसा शहर मध्य प्रदेश की राजधानी ना बन पाता। 

पुरानी क्या बात करना, ताजा उदाहरण है। 2018 में एक आदमी ने जातिवाद की राजनीति शुरू करते हुए 'माई का लाल' कहा था। उसे उम्मीद थी कि ऐसा करने से जाति विशेष के लोग उससे मोहित हो जाएंगे और उसे प्रचंड समर्थन प्राप्त होगा। उसके बंगले में लोगों ने उसे क्या फीडबैक दिया, यह तो उसे ही पता होगा, लेकिन पब्लिक का फीडबैक क्या था यह सभी जानते हैं। 

सन 2019 से एक आदमी लगातार इसी तरह की गोलबंदी करने की कोशिश कर रहा है। वह नहीं जानता कि यह मध्य प्रदेश की संस्कृति नहीं है। मध्य प्रदेश की जनता वर्गों में नहीं बंटती। 27% हो या फिर 57%, इसके बदले ठप्पा नहीं लगेगा। मध्य प्रदेश की जनता का माइंड सेट कुछ और है। यहां पब्लिक सरकार का मूल्यांकन करती है। 2003 में भी सरकार का मूल्यांकन किया था। 2018 में भी ऐसा ही हुआ और 2023 में भी मूल्यांकन ही होगा। यह भारत का मध्य है, यहां लहर, बवंडर, सुनामी और तूफान नहीं आते। ब्लैक होल जैसी शांति और उसके भीतर शोर होता है। ✒ उपदेश अवस्थी