कर्मचारियों की पुरानी पेंशन की मांग हल्के में लेना सरकारों को मंहगा पड़ सकता है - Khula Khat

रमेश पाटिल (वरिष्ठ अध्यापक)।
सत्ता के नशे में चूर सरकारें जनभावना का खुला उल्लंघन करने लगती हैं। इससे जनता की भावनाए आहत होते रहती है और एक बडे वर्ग में असंतोष की लहर दौडने लगती है। यहा सरकारें लोकतांत्रिक तरीके से चुनावों के माध्यम से बनती है। जनता के बडे वर्ग का असंतोष जब चुनावो में सत्ताधारी दल पर कहर बनकर टूटता है तो सत्ता का नशा टूटने में देर नही लगती।

सत्ता हाथ से निकल चुकी होती है। सरकारों को सत्ता से बेदखल करने में बहुत से फैक्टर एक साथ काम करते हैं। जिसमे सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर कर्मचारी संवर्ग का होता है। सरकारों के लिए कर्मचारी संवर्ग की नाराजगी भांपना आसान नही होता। सरकारी कर्मचारी नियमों में बंधा होने के कारण अपने असंतोष को खुलकर जाहिर नही करता लेकिन उसको भी सबके समान एक वोट देने का अधिकार होता है और अपने असंतोष को वह सत्ताधारी दल के खिलाफ वोट डालकर व्यक्त कर देता है। हाल-फिलहाल में ऐसे कई उदाहरण हमने देखे है जिसमें जनता के साथ कर्मचारियो के असंतोष के योग से प्रदेशो की सरकारे बदली है।

कर्मचारियों की मांगो का सिलसिला हमेशा चलते रहता है क्योंकि सरकारें उनको बिन मांगे और बगैर संघर्ष के कुछ देना ही भूल गई है। कर्मचारियों में बिल्कुल एक नई मांग ने पूरे देश में जोर पकडा है जो उनके सेवानिवृत्ति भविष्य की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है। कर्मचारियों की मांग में यह शायद सबसे गंभीर और भावनात्मक मांग है जिससे वह लेशमात्र भी पीछे हटना नही चाहता है। बात हो रही है कर्मचारियों के पुरानी पेंशन बहाली की जो देश के में कर्मचारियों का सबसे बडा मुद्दा बनके उभरा है। जिसके दायरे में केन्द्र और राज्य सरकारो के लगभग 70 लाख कर्मचारी आते है।

पुरानी पेंशन बनाम देशप्रेम को मुद्दा बनाकर सबसे पहले केन्द्र सरकार ने और बाद में केन्द्र सरकार का अनुसरण करते हुए राज्य सरकारो ने पुरानी पेंशन बंद कर कर्मचारियो के सेवानिवृत्त सुरक्षित भविष्य का गला घोट दिया और कर्मचारियो के सेवानिवृत्त भविष्य को नेशनल पेंशन स्कीम (NPS) के माध्यम से शेयर बाजार के हवाले कर दिया।जिसके दुष्परिणाम आना चालु हो गये है।कर्मचारियो के सेवानिवृत्त भविष्य को सुरक्षित करने के लिए बरसो से जमा की जा रही जमापूंजी शेयर बाजार के माध्यम से पूंजीपतियो के भेंट चढ रही है और कर्मचारियो के दामन में अपने सेवानिवृत्त भविष्य को सुरक्षित करने के नाम कौडिया आ रही है जो कर्मचारी का उपहास उडाते प्रतीत होती है कि हिम्मत हो तो अपने सेवानिवृत्त जीवन की सुरक्षा कर लो।

जिसने जीवन के अधिकांश समय तक सरकारी नौकरी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से की हो और सम्मानपूर्वक जीवन जिया हो सेवानिवृत्त होते ही NPS से मिलने वाली अत्यंत अल्प राशि से जीवन की दुश्वारियो की शुरुआत हो जाती है।सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा तो न जाने कहा विलुप्त हो जाती है पता ही नही चलता ऊपर से जीवन जीने के लाले पड जाते है।

देश का 70 लाख पुरानी पेंशन विहीन कर्मचारी केन्द्र और राज्य सरकारो से NPS के दुष्परिणाम से बार-बार अवगत करा रहा है।इसके पीछे कर्मचारी की प्रबल ईच्छा यही है कि पुरानी पेंशन बहाल कर सेवानिवृत्त जीवन में सरकारे उसकी सामाजिक सुरक्षा करे जैसा की इसका संविधान में उल्लेख है और सरकारो का दायित्व भी है।

पुरानी पेंशन बंद कर नेशनल पेंशन स्कीम लागू करने के केन्द्र सरकार के निर्णय का अंधानुकरण राज्य सरकारो ने अलग-अलग समय पर किया।लेकिन आज भी पश्चिम बंगाल की सरकार इससे अछुती है।उन्हे अपने कर्मचारियो के सेवानिवृत्ति पश्चात सामाजिक सुरक्षा और संवैधानिक मर्यादाओ का भान है इसलिए उन्होंने पुरानी पेंशन को बंद करने का कभी विचार ही नही किया।

इसमें कोई शक नही की कर्मचारी संवर्ग एक बहुत बड़ा वर्ग है।वह सत्ता के समीकरण बनाने-बिगाडने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।कर्मचारी संवर्ग को खूश कर सत्ता में काबिज होने के लिए कई राजनीतिक दलो के नेताओ ने चुनावी समर में पुरानी पेंशन बहाली का वादा भी किया और सत्ता भी हासिल कर ली लेकिन वे अपने वादे पर खरे नही उतरे।वादा खिलाफियो और सरकारो की असंवेदनशीलता से कर्मचारी संवर्ग में पुरानी पेंशन बहाली की चिंगारी अब आग बन चुकी है जिसकी लपटे कई राजनीतिक दलो के सत्तासीन होने के सपने को चकनाचूर कर सकती है। इसमें दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार अपवाद है जिन्होंने पुरानी पेंशन बहाली का समर्थन तो किया ही साथ ही इसे विधानसभा में पारित भी किया।

चूंकि दिल्ली सरकार को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नही है इसलिए विधानसभा में पारित निर्णय को लागू करने में उपराज्यपाल की भूमिका होती है जो केन्द्र सरकार का संवैधानिक प्रतिनिधि होता है अतः उनके द्वारा इसे आज तक लागू नही किया गया।चूँकि पुरानी पेंशन बहाल करना राज्य सरकारो का स्वतंत्र विषय है लेकिन दिल्ली को छोड़कर किसी राज्य की विभिन्न राजनीतिक दलो की सरकारो ने अरविंद केजरीवाल की तरह साहस का परिचय नही दिया।पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त सरकारो ने यदि पुरानी पेंशन बहाली का फैसला अपनी विधानसभा में लिया होता तो उसे लागू होने से कोई रोक नही सकता था।

अभी तक तो केन्द्र और राज्यो में पक्ष-विपक्ष के कई संवेदनशील राजनेता कर्मचारियो के पक्ष में अपने-अपने सदनो में पुरानी पेंशन बहाली की मांग को उठा चुके है लेकिन केन्द्र और राज्यो में सरकारी स्तर पर सामूहिक सहमति नही बन पाई है।सरकारो को कर्मचारियो की सेवानिवृत्ति पश्चात सामाजिक सुरक्षा के लिए पुरानी पेंशन की मांग को गंभीरता से लेना होगा अन्यथा फर्क इतना पडेगा की कर्मचारियो की नाराजगी के बावजूद सरकारे तो बनते रहेगी यही लोकतंत्र है लेकिन सरकार बनाने वाले राजनीतिक दल जरूर बदले-बदले नजर आयेगे।

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