ग्वालियर में जय विलास पैलेस के ठीक सामने स्थित विशाल पहाड़ी पर एक दिव्य मंदिर स्थापित है। इस मंदिर की कई विशेषताएं और चमत्कार हैं। यह मंदिर इष्ट नहीं बल्कि भक्त के नाम से प्रख्यात है। यह मंदिर डेढ़ सौ साल पहले बना लेकिन प्रतिमा कितनी प्राचीन है किसी को नहीं पता क्योंकि प्रतिमा को सतारा महाराष्ट्र में स्थापित एक मंदिर से लाया गया था। श्री महाकाली अष्टभुजा महिषासुरमर्दिनी, भक्तों की रक्षा करती है। इसका जीवित प्रमाण है, ग्वालियर में अब तक सिंधिया राजवंश की प्रतिष्ठा, अन्यथा देश के तमाम राजवंश या तो समाप्त हो चुके हैं या फिर अपनी प्रतिष्ठा खो चुके हैं। तो चलिए आज आपको भक्तों की रक्षा करने वाली श्री महाकाली अष्टभुजा महिषासुरमर्दिनी मांढरेवाली माता की कथा सुनाता हूं:-
॥ मांढरे वाली माता महिमा वर्णनम् ॥
प्रथम अध्याय: देवी का प्राकट्य और भक्त की गाथा
प्रिय भक्त! अब मैं आपको उस दिव्य कथा का श्रवण कराता हूँ, जो ग्वालियर की पावन धरा पर कैंसर पहाड़ी पर स्थित श्री महाकाली अष्टभुजा महिषासुरमर्दिनी के मंदिर की महिमा का गुणगान करती है। जिसे लोकमानस में श्रद्धावश 'मांढरे वाली माता' कहा जाता है।
इतिहास साक्षी है कि उन्नीसवीं शताब्दी में महाराजा जयाजीराव सिंधिया के शासनकाल में, महाराष्ट्र के सतारा से आनंदराव मांढरे नामक एक परम भक्त ग्वालियर आए। वे महाराज की सेना में कर्नल के पद पर प्रतिष्ठित थे। आनंदराव पूर्व में सतारा में माता की अनन्य भक्ति किया करते थे। जब आनंद राव ग्वालियर आ गए तो प्रतिदिन माता के दर्शन नहीं कर पाते थे। इसके कारण उनके मन में एक दुख का भाव रहता था। माता ने अपने प्रिय भक्त का दुख दूर करने का निर्णय लिया और उनके स्वप्न में दर्शन देने लगी।
द्वितीय अध्याय: दिव्य आदेश और मंदिर स्थापना
देवी माँ ने स्वप्न में कर्नल मांढरे को आने वाले राजनैतिक और सैन्य संकटों के प्रति सचेत करना आरम्भ किया, जो सदैव सत्य सिद्ध होते थे। एक समय माता ने दिव्य वाणी में कहा - "हे भक्त! या तो तू मेरे पास आ जा, या मुझे अपने पास ले चल"।
इस ईश्वरीय आदेश को शिरोधार्य कर, जब कर्नल मांढरे ने यह बात महाराजा को बताई तो महाराजा ने कर्नल मांढरे को मुक्त नहीं किया बल्कि, सवा तेरह बीघा भूमि दान की और भव्य मंदिर का निर्माण कराया। संवत् १८८० के उस कालखंड में, महाराष्ट्र से माता की अष्टभुजा प्रतिमा लाकर यहाँ स्थापित की गई। इसके बाद कर्नल मांढरे ने अपना शेष जीवन सेना त्यागकर माता की सेवा में समर्पित कर दिया, अतः लोक-परंपरा में जगज्जननी का नाम उनके अनन्य भक्त के नाम पर 'मांढरे वाली माता' प्रसिद्ध हो गया। कहा जाता है कि महिषासुरमर्दिनी की असीम कृपा के कारण ही सिंधिया राजवंश आज भी अटल और सुरक्षित है। जबकि उनसे बड़े और छोटे मराठा राजवंश या तो समाप्त हो चुके हैं या फिर अपनी प्रतिष्ठा खो चुके हैं।
तृतीय अध्याय: राजभक्ति और दिव्य झरोखा
माता, सिंधिया राजवंश की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। महाराज जयाजीराव की भक्ति ऐसी प्रगाढ़ थी कि वे माता के दर्शन किए बिना अन्न ग्रहण नहीं करते थे। इसके लिए उन्होंने जय विलास पैलेस में एक विशेष झरोखा बनवाया, जहाँ से दूरबीन के माध्यम से वे प्रतिदिन पर्वत शिखर पर विराजमान अपनी कुलदेवी का प्रथम दर्शन किया करते थे। आज भी यह परंपरा जीवित है कि सिंधिया परिवार का कोई भी शुभ कार्य माता की अनुमति और पूजन के बिना संपन्न नहीं होता।
चतुर्थ अध्याय: विजयोत्सव और शमी पूजन महिमा
विजयादशमी के पावन पर्व पर यहाँ एक अद्भुत उत्सव होता है। सिंधिया राजवंश के वर्तमान मुखिया अपनी पारंपरिक राजकीय पोशाक धारण कर सपरिवार माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। यहाँ स्थित शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है। मराठा योद्धाओं की रीति के अनुसार, तलवार से शमी की शाखा को स्पर्श किया जाता है और उसकी पत्तियों को 'सोना' मानकर भक्त अपने घर ले जाते हैं, जो विजय और समृद्धि का प्रतीक है।
पंचम अध्याय: फलश्रुति और महिमा
हे श्रेष्ठ भक्तों! जो भी श्रद्धालु इस पर्वत पर आकर माता के चरणों में घंटी अर्पित करने का संकल्प लेता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। नवरात्र के समय यहाँ प्रज्वलित होने वाली अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से कुल के विघ्न शांत हो जाते हैं। जो मनुष्य इस दिव्य कथा का श्रवण या पठन करता है, उस पर अष्टभुजा धारिणी माँ महाकाली सदैव प्रसन्न रहती हैं।
॥पण्डितोपदेशावस्थीविरचितं
मांढरेवालीमातुः दिव्यकथासम्पूर्णम्॥

