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तलाशिये, वो कौन है जिसने “गण’ और “तंत्र” को आपस में भिड़ा दिया - Pratidin

दिल्ली के लाल किले खालसा पन्थ का निशान यानि झंडा लगा दिया गया | शांति पूर्ण ट्रेक्टर रैली का वादा करने वालो ने पुलिस के पीछे ट्रेक्टर दौड़ा दिए |पुलिस ने लाठी भांजी, आंसू गैस छोड़ी, जवाब में पथराव हुआ | इसी अफरातफरी में दिल्ली में एक और अन्य राज्यों से कुछ मौतों की सूचना है |वो सारे नेता गायब हैं, जो पूरे आन्दोलन को हवा दे रहे थे | भारत में गणतंत्र दिवस पर “गण” और “तंत्र” के बीचखाई को और चौड़ी करने में कुछ लोग सफल हो गये है | आप “गण” के साथ खड़े हो या “तन्त्र”का हिस्सा हों, उन लोगों को जरुर तलाशिये, जिन्होंने भारत को आज इस दशा में ला दिया है | सरकार तो सामूहिक उत्तरदायित्व का नाम होता है, अब गृह मंत्री बैठक करें, या प्रधानमंत्री कुछ बोले इस भिडंत के घाव तो सालों हरे रहेंगे |

देश के माथे पर लगे इस कलंक को लेकर कई प्रकार के सवाल उठ रहे है और उठाये जायेंगे |जैसे जहाँ खालसा का झंडा लगा यह वो पवित्र ध्वज स्थल है जहाँ पर 15 अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते है|इसे राष्ट्रीय स्मारक का अपमान कहा जा रहा है | ज्यदा पुरानी बात नहीं है, साल भर नहीं बीता है, दिल्ली दौरे में लालकिला पहुंचा तो पता चला अब लाल किला में शौचालय और पेय जल की व्यवस्था तो हो चुकी हैं। लेकिन जिस वैश्विक स्तर पर पर्यटकों को जो सुविधाएं देने के बात कही गई थी, वह कहीं नजर नहीं आती है। आपको याद होगा, लाल किले को केंद्र सरकार करीब सौ से ज्यादा ऐतिहासिक इमारतों, किलों, महल और मंदिरों के साथ एक निजी कम्पनी के हवाले कर चुकी है। ऐसे अधिकांश किले-महल-मंदिर जो पहले भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन होते थे, अब किसी निजी कम्पनी के हवाले हैं । कई ऐतिहासिक-सांस्कृतिक इमारतें विश्व-विरासत की सूची में भी शामिल हैं। भारत की ऐतिहासिक विरासतों को निजी कंपनियों को सौंपने के पीछे जो तर्क और कारण दिए गए वो बहुत ठोस नजर नहीं आते हैं। आज पवित्रता की बात करना बेमानी है | 13 अप्रैल, 2018 से विश्व विख्यात लाल किला डालमिया भारत लिमिटेड के पास है । वैसे यह तथ्य जग जाहिर है कंपनी सीएसआर इनिशिएटिव यानी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत इनका रखरखाव कर रही है । अब शौचालय, पीने का पानी, रोशनी की व्यवस्था हुई है |

फिर भी बीते कल जो ध्वजारोहण हुआ उसे कहीं से वीरता नहीं कहा जा सकता |किसान और किसानी के साथ देश में जो सहनुभूति थी उसे इस ध्वजारोहण की योजना बनाने वाले योजनाकारों ने ध्वस्त करा दिया |इससे उन लोगों की राय को अकारण बल मिला जो इस आन्दोलन के आन्दोलनकारियों के लिए गलत-सलत संज्ञा और सर्वनाम खोज चुके थे |

अब बात जवाबदारी की | केंद्र और दिल्ली सरकार के बाद क्षमा याचना के साथ माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी इस स्थिति की जवाबदारी से मुकर नहीं सकते| हमेशा दोहरे आदेश के भंवरजाल के नाम पर अपनी खाल बचाती दिल्ली पुलिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ज्यादा भरोसा जो कर लिया था |

जिम्मेदारी कोई लेगा नहीं, जो जानें जानी थी चली गई | मुआवजा पीड़ा कम करेगा, पर “गण” और “तंत्र” के बीच बनी खाई कैसे पटेगी ? लाख नहीं करोड़ो का सवाल है |जो हाथ इस खाई को और चौड़ी करने में लगे है, उन पर करोड़ों के एवज में यह सब करने कराने के आरोप भी लग रहे है | सही क्या है ? गलत क्या है ? मालूम नहीं |बस इतनी बात पुख्ता है,”गण” “तंत्र” के खिलाफ है और “तंत्र” “गण” को 1947 के पहले का ही हिन्दुस्तानी मानने की भूल कर रहा है | ऐसे में आपकी जिम्मेदारी बनती है उन हाथो को मरोड़ दें जो इस खाई को रात दिन चौड़ी कर रहे हैं |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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