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सरकार कर्मचारियों से टैक्स टाइम पर लेती है तो फिर वेतन अनुशंसाए टाइम पर क्यों नहीं देती - MP EMPLOYEE NEWS

भोपाल
। मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष श्री प्रमोद तिवारी एवं प्रांतीय उपाध्यक्ष कन्हैयालाल लक्षकार अपनी संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि केंद्रीय कर्मचारियों के मुकाबले राज्य कर्मचारियों के बीच आपस में आर्थिक विभेद कर दोयम दर्जे का व्यवहार दशकों से जारी है। विडंबना देखिए कर्मचारियों की आय का पूरा ब्यौरा सरकारी दस्तावेजों में दर्ज रहता है। इसी आधार पर इनसे आयकर वसूली होती है। अतः यह वर्ग सबसे ईमानदार करदाता की श्रेणी में आता है। केंद्रीय कर्मचारियों के मुकाबले हर वेतनमान की अनुसंशाओं को लागू करने में राज्य सरकार अपना हाथ खींच लेती है। यह स्थिति देश की आजादी से अब तक बदस्तूर जारी है। 

बमुश्किल केंद्रीय वेतनमान की आधी अधूरी अनुसंशा लागू की गई। सातवें वेतनमान के आधार पर ही देखा जाए तो प्रासंगिक भत्तों जैसे टीए/डीए/एचआर के मामलों में राज्य सरकार की नीति उपेक्षापूर्ण ही रही है। वर्ष 1993 में कर्मचारियों के बड़े आंदोलन के फलस्वरूप राज्य सरकार ने लिखित समझौता किया था कि जब-जब केंद्रीय कर्मचारियों को डीए मिलेगा उसी तिथि एवं दर से राज्य कर्मचारियों को भी भुगतान किया जाएगा। कर्मचारियों की बदकिस्मती है की राज्य सरकार इस पर कायम नहीं रह पाई। केवल प्रदेश कोटे के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को तो केंद्रीय हिसाब से समस्त प्रासंगिक भत्तों का भुगतान किया जाता है, लेकिन राज्य कर्मचारियों को आर्थिक बदहाली में छोड़ दिया है। 

वर्तमान में केंद्र व राज्य कोटे के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों एवं पेंशनरों को 17 फीसदी डीए व एचआर दिया जा रहा है। सातवें वेतनमान का एरियर दो किश्तों में 2018 में दिया जा चुका है। इनसे राज्य कर्मचारियों एवं पेंशनरों  को वंचित कर 12 फीसदी डीए डीआर ही दिया जा रहा है। एचआर टीए तो छठे वेतनमान के आधार पर ही भुगतान हो रहा है। राज्य कर्मचारियों के एक ही संवर्ग के कर्मचारियों में भी विचित्र स्थिति निर्मित कर रखी है। शिक्षकों को केंद्र में 9300-34800 ग्रेड पे 4200 दिया गया। इसके विपरीत राज्य में वेतनमान 5200-20200 ग्रेड पे 2400 दिया गया। 

केंद्रीय प्रारंभिक वेतनमान ग्रेड पे 4200 देने में तीन क्रमोन्नति तीस वर्ष सेवाकाल पूर्ण होने पर दी जो नियमानुसार तृतीय क्रमोन्नति वेतनमान 15600-60600 में ग्रेड पे 6600 दी जाकर पदोन्नति पदनाम दिया जाना चाहिए था। वर्ष  1992 में तात्कालिक पटवा सरकार ने नियमित शिक्षकों के स्थान पर मानसेवी शिक्षकों का पांच सौ रूपये मासिक अप(मानदेय) पर 89 दिन की नियुक्ति देकर शोषण का श्रीगणेश किया था।सत्ता परिवर्तन के साथ दिग्विजयसिंह सरकार ने शिक्षक संवर्ग को 1994 से डाइंग केडर(मृत संवर्ग) घोषित कर 1995 से शिक्षाकर्मी 1,2 व 3 के रूप में 600, 700 व 800 रूपये (अप) मानदेय पर नियुक्ति दी थी। इसमें तीन वर्ष तक लटका कर अनुभव के आधार पर 2550 रूपये मासिक पर 1998 में पुनः नियुक्ति दी गई। इन नियुक्तियों को नये कलेवर में पुनः (ठेका पद्धति) संविदा पर नियुक्ति देकर 2008 में नाम बदलकर अध्यापक संवर्ग नाम से नवाजा गया है। 

इस बीच 1996, 2006 व 2016 से केंद्र व राज्य कर्मचारियों को पांचवा, छठा व सातवां वेतनमान दिया गया।  अध्यापक संवर्ग को राज्य कर्मचारियों से दस साल बाद 2016 से छठा वेतनमान व ढाई वर्ष बाद जुलाई 2018 सातवां वेतनमान देते हुए नवीन शिक्षक संवर्ग नाम दिया गया। 1995 से नियुक्त उक्त शिक्षकों को तकनीकी रूप से पुरनी पेंशन का हकदार माना जाना चाहिए लेकिन हकमर्दन किया जा रहा है। यह तो एक विभाग की करमकथा है, कमोबेश सभी विभागों के यही हाल है। कितनी विचित्र स्थिति है कि माननीयों को शपथ ग्रहण करते ही पुरानी पेंशन योजना का लाभ दिया जाता है, इसके उलट पुरा जीवन शासकीय सेवा में खपाने के बाद भी नवीन पेंशन योजना के नाम पर नाम मात्र के मासिक भुगतान का प्रावधान है जो आर्थिक रूप से बुढ़ापा बिगाड़ने का षड़यंत्र है। 

सरकार को दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ दशकों से प्रचलित कर्मचारियों के दोयम दर्जे के आर्थिक शोषण के कलंक को धोना ही श्रेयस्कर होगा। प्रदेश के संवेदनशील माननीय मुख्यमंत्री श्रीमान शिवराजसिंह जी चौहान से काफी उम्मीदें हैं, आशा है इस पर सहानुभूति पूर्वक निर्णय लिया जाकर नया इतिहास रचा जाएगा।

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